कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी मामले को खासकर इस आधार पर बंद नहीं किया जा सकता और आरोपी को शिकायतकर्ता से जिरह करने से इस आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता कि उसने अंतरिम क्षतिपूर्ति रकम का भुगतान नहीं किया है।
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि आरोपी शिकायतकर्ता से जिरह करने के अधिकार का दावा कर सकता है, भले ही उसने अंतरिम क्षतिपूर्ति जमा नहीं कर आदेश का उल्लंघन किया हो। उच्च न्यायालय ने कहा, जिरह का अधिकार एक महत्वपूर्ण अधिकार है।
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किसी मामले को खासकर इस आधार पर बंद नहीं किया जा सकता और आरोपी को शिकायतकर्ता से जिरह करने से इस आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता कि उसने अंतरिम क्षतिपूर्ति रकम का भुगतान नहीं किया है। कोलार के होहाल्ली गांव के मुरली तथा कोलार के किलारिपेट के वेंकेटेशप्पा के बीच पैसों का लेन-देन हुआ था। मुरली का 10 लाख रुपये का चेक नहीं भुन पाया था, जिससे आपराधिक मामला बना था। मजिस्ट्रेट अदालत ने मुरली को सुनवाई के लंबित रहने तक उस रकम का दस फीसदी हिस्सा क्षतिपूर्ति के रूप में जमा करने का आदेश दिया था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।
मजिस्ट्रेट अदालत ने वेंकेटेशप्पा से जिरह करने के लिए उसके आवेदन को मंजूर नहीं किया था। तब मुरली उच्च न्यायालय चला गया। अदालत ने मुरली के पक्ष में फैसला सुनाया और कहा कि 10 जनवरी, 2022 के अपने आदेश में विद्वान मजिस्ट्रेट ने अंतरिम मुआवजे के दस फीसदी के भुगतान के आधार पर जिरह से वंचित कर भारी गलती की है।