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कर्नाटक सरकार का सख्त कदम: अब हर 'टीनएज प्रेग्नेंसी' का होगा ऑडिट, जिम्मेदारों की तय होगी जवाबदेही

Tue, 07 Apr 2026 07:35 PM IST
राकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बंगलुरू

सार

कर्नाटक सरकार ने 10 से 18 वर्ष की लड़कियों में गर्भावस्था के मामलों की अनिवार्य ऑडिट का आदेश दिया है। तालुक स्वास्थ्य अधिकारियों के नेतृत्व में होने वाली इस जांच का मकसद बाल विवाह और शोषण की पहचान करना, स्वास्थ्य सेवाओं की कमियों को सुधारना और किशोरियों को शिक्षा-सुरक्षा के दायरे में वापस लाना है।
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कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
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विस्तार
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कर्नाटक सरकार ने राज्य में किशोरियों के बीच बढ़ते गर्भधारण के मामलों को रोकने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक बेहद कड़ा फैसला लिया है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से जारी नए आदेश के अनुसार, अब राज्य में होने वाली हर एक 'टीनएज प्रेग्नेंसी' का अनिवार्य रूप से ऑडिट किया जाएगा।
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तालुक स्तर पर तय होगी जवाबदेही
सरकार के इस फैसले के मुताबिक, संबंधित तालुक स्वास्थ्य अधिकारी (टीएओ) को प्रत्येक मामले की व्यक्तिगत रूप से समीक्षा करनी होगी। यह केवल एक कागजी कार्रवाई नहीं होगी, बल्कि अधिकारी को यह जांचना होगा कि गर्भधारण किन परिस्थितियों में हुआ? क्या किशोरी को समय पर चिकित्सा सहायता मिली और क्या इसमें किसी प्रकार का शोषण या बाल विवाह शामिल है?

निजी अस्पतालों को भी देना होगा हिसाब
सरकार ने साफ कर दिया है कि अब कोई भी मामला छिपाया नहीं जा सकेगा। सभी सरकारी और निजी स्वास्थ्य संस्थानों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि वे 10 से 18 वर्ष की गर्भवती लड़कियों की जानकारी आरसीएच पोर्टल पर दर्ज करें। इस ऑडिट के दौरान किशोरी की शादी की उम्र, उसकी शिक्षा, प्रजनन स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और उसके परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का बारीकी से विश्लेषण किया जाएगा।
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क्यों सख्त हुई सरकार?
किशोरावस्था में गर्भधारण न केवल एक सामाजिक बुराई है, बल्कि यह एक गंभीर स्वास्थ्य संकट भी है। सरकार ने माना है कि कम उम्र में मां बनना लड़की के लिए जानलेवा हो सकता है। इससे मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) बढ़ने का खतरा रहता है और जन्म लेने वाले बच्चे भी कुपोषित पैदा होते हैं। इसके अलावा, ऐसी स्थिति में लड़कियों की पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है।
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सिस्टम की कमियों को दूर करने की तैयारी
इस मिशन को सफल बनाने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक कल्याण विभाग मिलकर काम करेंगे। तालुक स्तर पर एक ऑडिट कमेटी बनेगी, जिसमें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के डॉक्टर, आंगनवाड़ी वर्कर और स्कूलों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इसके अलावा 'स्नेहा केंद्रों' के जरिए काउंसलिंग और गर्भनिरोधक उपायों तक पहुंच को भी मजबूत किया जाएगा, जिससे स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों को सुरक्षा दी जा सके। प्रशासन ने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान पीड़िता की गोपनीयता का पूरा ध्यान रखा जाएगा और बाल संरक्षण कानूनों के तहत सख्त रिपोर्टिंग सुनिश्चित की जाएगी।


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