कर्नाटक के साढ़े चार करोड़ से भी ज्यादा मतदाता अगले पांच साल के लिए अपनी सरकार चुनने के लिए मतदान कर चुके हैं। विकास और भ्रष्टाचार के मुद्दों से शुरू हुआ चुनाव प्रचार आखिर तक आते-आते अहिंदा के जातीय समीकरण और हिंदुत्व के ध्रुवीकरण की लड़ाई में बदल गया।
अगर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के अहिंदा समीकरण के अपने पक्ष में गोलबंद होने वाले लिंगायत कार्ड का दांव कामयाब हुआ तो कांग्रेस की सरकार बनने की संभावना बनती है, लेकिन अगर भाजपा अपने लिंगायत, सवर्ण जनाधार को समेटे रखते हुए हिंदुत्व के ध्रुवीकरण के दांव के जरिए अहिंदा को कमजोर करने में कामयाब रही तो कर्नाटक की गद्दी के लिए उसकी राह आसान होगी।
अगर जनता दल (एस) अपने प्रभावक्षेत्र में वोक्कालिगा के साथ अपने मुस्लिम वोटों को बनाए रखने में कामयाब हुआ तो त्रिशंकु विधानसभा में सत्ता की कुंजी देवेगौड़ा परिवार के हाथ में होगी।
चुनाव प्रचार के पहले दौर में कांग्रेस के मुकाबले भाजपा पिछड़ती दिखाई दे रही थी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मैदान में उतरते ही भाजपा कार्यकर्तांओं और समर्थकों में खासा जोश आ गया और भाजपा कड़े मुकाबले में आ गई। खासकर तटीय कर्नाटक, बेंगालुरू, मध्य कर्नाटक, हैदराबाद कर्नाटक के भाजपा के प्रभावक्षेत्र में मोदी की रैलियों का काफी असर पड़ा। इन रैलियों के जरिए भाजपा ने हिंदुत्व के ध्रुवीकरण का दांव भी जमकर खेला।