जदएस के साथ गठबंधन के तहत 17 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली बसपा के एन महेश ने कोलेगल सीट से कांग्रेस के एआर कृष्णमूर्ति को 19,500 मतों से पराजित किया, लेकिन इसके अलावा उसका कोई भी उम्मीदवार असर छोड़ने में नाकामयाब रहा।
राज्यपाल के पास कांग्रेस-जदएस गठबंधन को सरकार बनाने का न्यौता देने के अलावा कोई चारा नहीं है। हमारे पास संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधानों के अनुसार स्पष्ट बहुमत है।
- रणदीप सिंह सुरजेवाला, कांग्रेस प्रवक्ता
कांग्रेस पिछले दरवाजे से सत्ता हासिल करना चाहती है, जबकि जनादेश कांग्रेस मुक्त कर्नाटक का है।
- बीएस येदियुरप्पा, भाजपा के पूर्व सीएम
भाजपा: इस बात की पूरी संभावना है कि राज्यपाल सबसे बड़े दल के रूप में भाजपा को न्यौता देंगे। सदन में बहुमत साबित करने के लिए वह दो निर्दल और बसपा के एक विधायक को अपने पाले में ला सकती है। इसके अलावा कांग्रेस या जदएस के कुछ विधायकों से इस्तीफा दिलवा सकती है। इससे बहुमत का आंकड़ा घट जाएगा, जिसे पार करना उसके लिए आसान हो जाएगा।
कांग्रेस: चुनाव बाद जदएस से गठबंधन करने के कारण कांग्रेस के इस मोर्चे को न्यौता मिलने की उम्मीद कम। अगर भाजपा बहुमत साबित नहीं कर पाती है तो राज्यपाल इस मोर्चे को आमंत्रित कर सकते हैं, लेकिन इसकी संभावना कम है।
मोदी का जादू कायम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सम्मोहक व्यक्तित्व और उससे पैदा होने वाली प्रलयकारी ताकत के आगे कांग्रेस बेबस है। इस चुनाव में तूफानी दौरा कर मोदी ने अकेले दम पर अपनी पार्टी को दक्षिण में फिर प्रवेश दिलाया।
शाह का तोड़ नहीं
मोदी के अलावा अगर भाजपा में किसी के सिर पर इस जीत का सेहरा बंधना चाहिए तो वे हैं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह। चुनाव प्रबंधन में इस समय उनका कोई सानी नहीं है। उनकी अथाह ऊर्जा और अनथक प्रयास बेमिसाल हैं।
गुजरात के बाद कर्नाटक में भी उनका ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ बुरी तरह फेल हुआ। मठों और मंदिरों में मत्था टेकना काम नहीं आया। उदासीन राजनेता की छवि तोड़ी लेकिन मोदी के करिश्मा को तोड़ने के लिए उनके तरकश में कोई तीर नहीं है।
कांग्रेस को फंड का टोटा
देश के तमाम राज्यों से सफाया होने के बाद कांग्रेस के पास कर्नाटक ही एक ऐसा राज्य बचा था, जहां से पार्टी का खर्च पूरा होता था। इस राज्य को खोने का मतलब साफ है कि भविष्य में पार्टी को फंड की भारी कमी होने वाली है।
लिंगायत कार्ड नहीं चला
कांग्रेस द्वारा लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देने का दाव उल्टा पड़ा। भाजपा जनता को यह समझाने में सफल रही कि कांग्रेस के पास ‘बांटो और राज करो’ के अलावा चुनाव जीतने की कोई दूसरी रणनीति नहीं है।