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कर्नाटक विधानसभा चुनाव: जातियों के जोड़-घटाव और दो व्यक्तियों पर टिकी सियासत

Tue, 27 Mar 2018 03:52 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बंगलूरू
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कर्नाटक में 15वीं विधानसभा के लिए 12 मई को होने जा रहे चुनाव में मुख्य मुकाबला सत्ताधारी कांग्रेस और विपक्षी भाजपा के बीच है। दो पार्टियों से ज्यादा यह दो व्यक्तित्वों की लड़ाई होगी जिसमें एक तरफ हैं मुख्यमंत्री सिद्धरमैया और दूसरी तरफ हैं पूर्व सीएम और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बीएस येद्दयुरप्पा।
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जेडीएस से आकर कांग्रेस में वर्चस्व स्थापित कर सिद्धरमैया ने साबित कर दिया है कि वे कितने कद्दावर है, दूसरी तरफ भाजपा अभी तक नहीं भूली है कि 2013 के विधानसभा चुनाव में येद्दयुरप्पा के पार्टी से अलग होने की उसे कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी। 

पिछले विधानसभा चुनाव में कर्नाटक जनता पक्ष के नाम से पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने वाले येद्दयुरप्पा भले ही छह सीटें ही जीत पाए थे लेकिन उन्होंने कई सीटों पर भाजपा को नुकसान पहुंचाया था। उनके अलावा भाजपा के एक अन्य बड़े नेता बी श्रीरामुलु ने बीएसआरसीपी के नाम से पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा और चार सीटें जीतीं। भाजपा के वोटों के बंटवारे का फायदा कांग्रेस को हुआ जिसने 122 सीटों पर सफलता हासिल की और सीद्धरमैया के नेतृत्व में सरकार बनाई। 
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पहली बार 2004 में त्रिशंकु विधानसभा
कर्नाटक के इतिहास में पहली बार 12वीं विधानसभा के लिए संपन्न चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। भाजपा ने 79 सीट जीतकर दमखम तो दिखाया लेकिन बहुमत से काफी दूर रही। कांग्रेस 65 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की जेडीएस को 58 सीटों के साथ तीसरा स्थान मिला।

भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए देवेगौड़ा ने कांग्रेस के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाने का फैसला किया और एन धरम सिंह मुख्यमंत्री बने और डिप्टी सीएम का पद जेडीएस के सिद्धरमैया को मिला।

कुमारस्वामी का कमाल

- फोटो : ANI
यह सरकार दो साल ही चल पाई थी कि देवेगौड़ा के बेटे एचडी कुमारस्वामी ने 2006 की शुरुआत में कांग्रेस सरकार से समर्थन वापस ले लिया और भाजपा के सहयोग से सरकार बनाने में सफल रहे। मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के डिप्टी का पद भाजपा के बीएस येद्दयुरप्पा को मिला।

दोनों पार्टियों के बीच बनी सहमति के अनुसार 20 महीने बाद येद्दयुरप्पा को सीएम का पद मिलना था लेकिन कुमारस्वामी ने अपना वादा तोड़ दिया और अक्तूबर, 2007 में यह सरकार गिर गई। बहरहाल, दोनों नेताओं के बीच कुछ समय के लिए फिर सहमति बनी और नवंबर, 2007 में येद्दयुरप्पा मुख्यमंत्री बने, लेकिन यह सरकार बहुत ज्यादा दिन नहीं चल पाई और राज्य को राष्ट्रपति शासन के हवाले कर दिया गया। राज्य में यह पहला मौका था जब तीन अलग-अलग दलों के नेता सीएम बने लेकिन चुनाव की नौबत नहीं आई।

भाजपा को मिली अपने दम पर सत्ता

वर्ष 2008 में हुए विधानसभा चुनाव में येद्दयुरप्पा की अगुवाई में भाजपा ने 110 सीटें हासिल की। हालांकि स्पष्ट बहुमत से वह 3 सीटें दूर रही लेकिन इस कमी को निर्दलीयों के समर्थन से पूरा कर लिया गया। इस तरह कर्नाटक में और दक्षिण भारत के किसी राज्य में पहली बार भाजपा की सरकार बनी।

जब गिरफ्तार किए गए येद्दयुरप्पा
यह सरकार गठन के बाद से ही लगातार विवादों में घिरी रही। अपनी कार्यशैली के कारण मुख्यमंत्री येद्दयुरप्पा को बेल्लारी के ताकतवर रेड्डी बंधुओं (करुणाकर, सोमशेखर और जनार्दन रेड्डी) और बी श्रीरामुलु जैसे कद्दावर नेताओं की बगावत भी झेलनी पड़ी। वर्ष 2011 में येद्दयुरप्पा को जमीन घोटाले में गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें सीएम की कुर्सी त्यागनी पड़ी।

अपनी जगह उन्होंने अपने विश्वस्त डी सदानंद गौड़ा को सीएम बना दिया, लेकिन जब उन्होंने अपनी राह चलनी शुरू की तो येद्दयुरप्पा ने पार्टी को अल्टीमेटम दे दिया कि अगर सीएम को नहीं हटाया गया तो वे पार्टी छोड़ देंगे। नतीजतन, गौड़ा को हटाकर जगदीश शेट्टार को मुख्यमंत्री बनाया गया।

लगातार 31 साल तक कांग्रेस का एकछत्र राज

जज के सामने ही रो पड़े येदुरप्पा - फोटो : getty
मैसूर से अलग होकर कर्नाटक के गठन के बाद 1951-52 में पहले विधानसभा चुनाव से लेकर 1983 में छठे चुनाव तक राज्य में कांग्रेस का एकछत्र राज रहा। पहली बार 1983 में जनता पार्टी के रामकृष्ण हेगड़े के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी सरकार बनी। बहरहाल, 1989 के चुनाव में सत्ता फिर कांग्रेस को मिल गई और वह 1994 तक राज करती रही। दिसंबर, 1994 में दसवें विधानसभा चुनाव में एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी, लेकिन वर्ष 1999 के अगले चुनाव में कांग्रेस ने फिर बाजी मार ली और एसएम कृष्णा राज्य के मुख्यमंत्री बने। 

जातियों का संघर्ष
देश के अन्य राज्यों की तरह कर्नाटक में भी चुनाव में जातियां अहम भूमिका निभाती हैं। राज्य में लिंगायत और वोक्कालिगा के बीच राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई चलती रहती है। अन्य पिछड़ी जातियों से संबंध रखने वाले इन दोनों समुदायों की आबादी 27 फीसदी है।

अब तक राज्य में लिंगायत समुदाय से सात और वोक्कालिगा से पांच मुख्यमंत्री हुए हैं। राज्य में इन दो समुदायों के अलावा कुरुबा की आबादी आठ फीसदी है। मुख्यमंत्री सिद्धरमैया और भाजपा में येद्दयुरप्पा के विरोधी केएस ईश्वरप्पा इसी जाति से हैं। राज्य में एससी और एसटी की आबादी 24 फीसदी है।

लिब्रा और अहिंदा
लिंगायत और ब्राह्मणों को मिलकर लिब्रा का गठजोड़ बनता है। इसके 60 फीसदी वोटरों पर भाजपा का असर है। दूसरी तरफ, दलित, बैकवर्ड और मुस्लिम को मिलाकर अहिंदा गठजोड़ बनता है, जिसका ज्यादातर हिस्सा कांग्रेस के पक्ष में खड़ा है। वोक्कालिगा परंपरागत रूप से देवेगौड़ा को समर्थन देते रहे हैं। उसके बाद कांग्रेस का नंबर आता है और अंत में भाजपा।

 
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विधानसभा चुनाव

वर्ष                कांग्रेस            भाजपा        जेडीएस        अन्य
2004            65                    79                58            22
2008            80                    110            28                6
2013            122                    40            40            21


लोकसभा चुनाव 
वर्ष                कांग्रेस            भाजपा            जेडीएस
2004                8                    18                2
2009                6                    19                3
2014                9                    17                2

राज्य की 84 फीसदी आबादी हिंदू

धर्म                    संख्या (प्रतिशत में)
हिंदू                        84
मुस्लिम                    12.92
ईसाई                        1.87
अन्य                         1.94
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