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Karnataka: सिद्धारमैया सरकार पर नियम तोड़ने के आरोप, 22 दलित-OBC मठों को सौंपी 255 करोड़ की जमीन; जानें सबकुछ

Mon, 26 Jan 2026 08:43 AM IST
अमन तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बंगलूरू

सार

कर्नाटक सरकार ने विभागों की चेतावनी को दरकिनार करते हुए बंगलूरू में 22 दलित और ओबीसी मठों को 255 करोड़ रुपये की जमीन देने का फैसला किया है। यह गोमाला जमीन है, जिसे नियमों के तहत निजी संस्थाओं को नहीं दिया जा सकता। अधिकारियों ने सरकार के फैसले पर सवाल उठाए है।
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सीएम सिद्दारमैया - फोटो : x/ @siddaramaiah
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विस्तार
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कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने बंगलूरू में 22 दलित और ओबीसी मठों को 255 करोड़ रुपये की जमीन देने का फैसला किया है। सरकार ने यह कदम तब उठाया है जब प्रमुख विभागों ने इस पर सख्त आपत्ति जताई थी। वित्त और कानून विभाग ने सलाह दी थी कि गोमाला जमीन और शहर की सीमा के अंदर की जमीन निजी संस्थाओं को नहीं दी जानी चाहिए।
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अधिकारियों ने दी थी कानूनी पचड़े की चेतावनी
दस्तावेजों से पता चला है कि अधिकारियों ने सरकार को चेतावनी दी थी कि इस फैसले से कानूनी जांच हो सकती है। नियमों के मुताबिक, गोमाला जमीन को निजी संगठनों को बेचा या दिया नहीं जा सकता। इसके अलावा, कर्नाटक भूमि अनुदान नियम-1969 कहता है कि शहर की सीमा के भीतर सरकारी जमीन सिर्फ सार्वजनिक उपयोग के लिए होनी चाहिए, न कि किसी निजी संस्था के लिए।

मंत्रियों का तर्क और संतों की मांग
वरिष्ठ मंत्रियों ने इन आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा कि ऐसी राय आना कोई नई बात नहीं है। सरकार ने पिछले हफ्ते इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। बता दें कि 2025 की शुरुआत में दलित और पिछड़े वर्ग के संतों ने अपने सामाजिक कार्यों और संस्थानों को चलाने के लिए सरकार से जमीन मांगी थी।
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कहां और कितनी जमीन मिली?
यह जमीन बंगलूरू उत्तर जिले के रावुत्तनहल्ली इलाके में है। सर्वे नंबर 57 और 58 के तहत कुल मिलाकर करीब 52 एकड़ जमीन इन संस्थानों को दी गई है। मठ के आकार और उनके काम को देखते हुए हर मठ को 20 गुंटा से लेकर चार एकड़ तक जमीन आवंटित की गई है।
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जमीन की कीमत और नए मठों पर सवाल
वित्त विभाग के अनुसार, अगर इस जमीन का विकास किया जाए तो इसकी कीमत 4.8 करोड़ रुपये प्रति एकड़ तक हो सकती है। वहीं, राजस्व अधिकारियों ने यह भी दावा किया है कि जमीन पाने वाले कुछ मठ बिल्कुल नए हैं। उनके पास ऐसा कोई पुराना रिकॉर्ड नहीं है जिससे उनके परोपकारी कामों को साबित किया जा सके। सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों का हवाला देते हुए अधिकारियों ने कहा था कि सार्वजनिक उपयोग वाली जमीन को संरक्षित रखा जाना चाहिए।

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