21वीं सदी में भी अंधविश्वास लोगों के सिर चढ़ा हुआ है। एक युवक ने मुहर्रम के अवसर पर इमाम हुसैन की याद में ऐसा खौफनाक कांड किया कि लोग सहम गए। आरोप है कि एक युवक ने रीति-रिवाज के नाम पर अपने एक साल के मासूम बच्चे को केले के पत्तों में लपेटकर आग के अंगारों में लिटा दिया।
मामला कर्नाटक के कुंडगोल का है। जहां एक युवक ने अंधविश्वास में पड़कर मुहर्रम के दौरान अपने बच्चे को अंगारों में लिटाया। देश के विभिन्न हिस्सों से काफी संख्या में लोग इस परपंरा में भाग लेने के लिए आते हैं। यह ऐसा पहला मामला नहीं है, जहां अल्लाह को खुश करने के नाम पर बच्चे की सुरक्षा की परवाह किए बिना ऐसे अजीब रिवाजों का पालन किया जाता है। वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ गांवों में बच्चे को छत से नीचे बिस्तर फेंके जाने का रिवाज है।
गौरतलब है कि हाल ही में, एक और अजीबोगरीब खबर प्रकाश में आयी थी, जिसमें तमिलनाडु के मदुरै जिले के मंदिर में परपंरा के नाम पर 15 दिनों तक लड़कियों को बिना कपड़ों के रहना होता है। लड़कियों को देवी के रूप में सजाया जाता है, लेकिन उनके शरीर के ऊपरी हिस्से पर कोई कपड़ा नहीं होता। इसमें 15 दिनों तक 7 या उससे अधिक लड़कियों को देवी के रूप में सजाया जाता है। उनकी पूजा की जाती है। लेकिन लड़कियों के शरीर के ऊपरी हिस्से पर कोई कपड़ा नहीं होता। हालांकि इस बार प्रशासन ने इस परंपरा के खिलाफ सख्ती दिखाते हुए लड़कियों के शरीर को ढकने का आदेश दिया है।
Karnataka: One-yr-old child, wrapped in banana leaves, made to lie down on embers as ritual during Muharram in Dharwad's Kundgol near Hubli pic.twitter.com/Q1vfvpz48p
— ANI (@ANI) October 1, 2017
जानिए आखिर क्यों मनाया जाता है मुहर्रम
मुहर्रम
- फोटो : amar ujala
इमाम हुसैन की शहादत की याद में मुहर्रम मनाया जाता है। यह कोई त्योहार नहीं बल्कि मातम का दिन है। इमाम हुसैन अल्लाह के रसूल यानि मैसेंजर पैगंबर मोहम्मद के नाती थे। मुहर्रम एक महीना है, जिसमें शिया मुस्लिम दस दिन तक इमाम हुसैन की याद में शोक मनाते हैं।
मोहम्मद साहब के मरने के लगभग 50 वर्ष बाद मक्का से दूर कर्बला के गवर्नर यजीद ने खुद को खलीफा घोषित कर दिया। कर्बला जिसे अब सीरिया के नाम से जाना जाता है। वहां यजीद इस्लाम का शहंशाह बनाना चाहता था। इसके लिए उसने आवाम में खौफ फैलाना शुरू कर दिया। लोगों को गुलाम बनाने के लिए वह उन पर अत्याचार करने लगा। यजीद पूरे अरब पर कब्जा करना चाहता था। लेकिन उसके सामने हजरत मुहम्मद के वारिस और उनके कुछ साथियों ने यजीद के सामने अपने घुटने नहीं टेके और जमकर मुकाबला किया।
अपने बीवी बच्चों की सलामती के लिए इमाम हुसैन मदीना से इराक की तरफ जा रहे थे तभी रास्ते में कर्बला के पास यजीद ने उन पर हमला कर दिया। इमाम हुसैन और उनके साथियों ने मिलकर यजीद की फौज से डटकर सामना किया। हुसैन लगभग 72 लोग थे और यजीद के पास 8000 से अधिक सैनिक थे लेकिन फिर भी उन लोगों ने यजीद की फौज के समाने घुटने नहीं टेके।
हालांकि वे इस युद्ध में जीत नहीं सके और सभी शहीद हो गए। किसी तरह हुसैन इस लड़ाई में बच गए। यह लड़ाई मुहर्रम 2 से 6 तक चली। आखिरी दिन हुसैन ने अपने साथियों को कब्र में दफन किया। मुहर्रम के दसवें दिन जब हुसैन नमाज अदा कर रहे थे, तब यजीद ने धोखे से उन्हें भी मरवा दिया। उस दिन से मुहर्रम को इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत के त्योहार के रूप में मनाया जाता है।