केन्द्रीय राजनीति ने एक बार फिर दक्षिण भारत की राजनीति का नया पैमाना तय कर दिया है। राजनीति के पंडितों का अनुमान है कि 2019 में दिल्ली की सत्ता का रास्ता 30 जिलों वाले कर्नाटक राज्य से होकर जाएगा। यहां तक कि चुनाव के नतीजे लोकसभा चुनाव के 2018 में या फिर 2019 में होने की संभावना को भी तय कर देंगे। इसलिए कांग्रेस और भाजपा जैसी दोनों राष्ट्रीय पार्टियों ने राज्य में बाजी मारने के लिए पूरा जोर लगा दिया है। दिलचस्प यह भी है कि इस बार का चुनाव जाति और धर्म के पेचीदा कॉकटेल में उलझ गया है।
राजनीति के जानकारों का मानना है कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018 में लिंगायत, वोक्कालिग्गा, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक, दलित वर्ग का रुझान निर्णायक भूमिका में रहेगा। इसके लिए सभी दलों ने जातीय समीकरण से लेकर वोटों के ध्रुवीकरण के हर दांव आजमाएं हैं।
सिद्धारमैया... सिद्धारमैया...
कर्नाटक में सत्ताधारी दल का सारा दारोमदार मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर टिका है। सिद्धारमैया ने राज्य में कन्नड़िया स्वाभिमान, दलित, मुस्लिम और पिछड़ा वर्ग के ध्रुवीकरण को केन्द्र में रखकर सर्वप्रिय नेता के रूप में अपनी छवि बनाई है। राज्य के लिए अलग झंडा और वीरशैव लिंगायत समुदाय को अलग अल्पसंख्यक धर्म का दर्जा देकर सिद्धारमैया ने भाजपा का संकट बढ़ाया है। पंजाब के बाद कर्नाटक में सिद्धारमैया ऐसे दूसरे नेता हैं, जिनके पीछे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राज्य की सत्ता में वापसी के लिए भरपूर ताकत से खड़े हुए हैं। यहां तक कि टिकट बंटवारे में भी सिद्धारमैया की ही सबसे अधिक चली है।
पार्टी के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे, कर्नाटक के कृषिमंत्री रहे और मजबूत बोक्कालिग्गा नेता कृष्णा वी गौड़ा समेत अन्य ने सिद्धारमैया को आगे करके एकजुटता से चुनाव लड़ने के पार्टी हाई कमान के दिशा निर्देशों को वरीयता दी है। कुल मिलाकर कांग्रेस का लक्ष्य 12 मई को होने वाले कुल मतदान का 36.5-38 फीसदी तक वोट पाना है। हालांकि कांग्रेस पार्टी के इस रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा सिद्धारमैया ही होंगे। सिद्धारमैया कर्नाटक में सात फीसदी की आबादी वाली कुरुब जाति के हैं। लिंगायत, वोक्कालिग्गा कुरुब सिद्धारमैया का कितना साथ देगा, यह चुनाव बाद पता चलेगा।
जद(एस) ने फंसाया पेंच
पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा की पार्टी जद(एस) करीब 10 साल से सत्ता से बाहर है। देवगौड़ा के पुत्र एचडी कुमार स्वामी पार्टी के सबसे प्रभावी और निर्णायक नेता हैं। लेकिन कर्नाटक के किसानों, दलितों, अल्पसंख्यकों और खासकर लिंगायत के बाद दूसरे स्तर का प्रभावी दर्ज रखने वाले वोक्कालिग्गा समाज में मजबूत पकड़ रखने वाले अपने पिता को चुनाव का मुख्य चेहरा बनाया है। बसपा और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने जद(एस) को समर्थन दे दिया है।
मंड्या, मैसूर, कोलार, चिकमंगलूर समेत 10 जिलों में जद(एस) दबदबा रखती है। ऐसे में जद(एस) को कर्नाटक विधानसभा चुनाव में किंग मेकर की भूमिका में भी देखा जा रहा है। कांग्रेस नेता बीके हरिप्रसाद भी मानते हैं कि जद(एस) इस चुनाव में मजबूत दावेदार है। हालांकि हरिप्रसाद के मुताबिक इससे कांग्रेस पार्टी के चुनाव में सफलता पाने पर कोई असर नहीं पड़ेगा।