जब वर्ष 2000 में कर्णम मल्लेश्वरी सिडनी ओलंपिक में भाग लेने पहुँची, तब तक एवरेस्ट के शिखर पर एक नहीं, दो-दो भारतीय महिलाएं कदम रख चुकी थीं। तब तक महिलाएं वायुसेना में हेलिकॉप्टर भी उड़ाने लगी थीं और एक महिला भारत की प्रधानमंत्री भी बन चुकी थी। लेकिन किसी भारतीय महिला ने ओलंपिक में पदक नहीं जीता था।
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सिडनी ओलंपिक में ये कारनामा कर दिखाया श्रीकाकुलम, आँध्रप्रदेश में जन्मी कर्णम मल्लेश्वरी ने। उन्होंने महिलाओं के 69 किलोवर्ग की भारोत्तोलन प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता।
कर्णम मल्लेश्वरी को वो दिन अब भी याद है। प्रतियोगिता से एक दिन पहले, रात को बेलारूस के उनके कोच लियोनिद तारानेनकोहे उनके कमरे में आए थे।
वो बताती हैं, “उन्होंने मुझसे कहा तुरंत सोने चली जाओ। लेकिन अगले दिन अगर आपका कंपटीशन हो, तो नींद कहाँ आने वाली थी। मैं लेटी हुई थी और मेरी टीम की अन्य खिलाड़ी आपस में बात कर रही थीं। मेरे कोच दोबारा राउंड लेने आए तो उन्होंने पाया कि मेरे कमरे की लाइट जली हुई थी और वो लड़कियाँ अब भी बातें कर रही थीं। वो बहुत जोर से गुस्सा हो गए और उन्होंने लड़कियों को बुरी तरह से डाँट कर ये कहते हुए भगा दिया कि तुम्हारे कंपटीशन पूरे हो गए। अब तुम सब निकलो यहाँ से।”
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मल्लेश्वरी याद करती हैं, “उसके बाद मेरे कमरे की लाइट ऑफ कर मेरे कोच चले गए। अगले दिन मैंने तड़के उठकर विलेज में थोड़े बहुत फूल जमा कर पूजा की। सूर्य प्रणाम किया और भगवान से प्रार्थना की कि मेरा दिन अच्छा बीते। टीम के बाकी लोगों ने मुझे शुभकामनाएं दीं।”
'एक बार जब आप किट पहन लेते हैं तो फिर कुछ सुनाई-दिखाई नहीं देता'
प्रतियोगिता के दिन मल्लेशवरी अपनी तरफ से पूरी तरह सहज होने की कोशिश कर रही थीं। लेकिन उनके दिल पर जो बीत रही थी वो किसी को दिखाई नहीं दे रहा था। वो पहली बार 69 किलोवर्ग में भाग ले रही थी। इससे पहले वो 63 किलोवर्ग में भाग लिया करती थीं।
मल्लेश्वरी ने बीबीसी को बताया, “हमने नाश्ता नहीं किया था, क्योंकि हमारा बॉडी वेट होना था। हम बस से सीधे वहीं गए। बस में भी मेरी पूरी कोशिश थी कि मैं खुद पर नियंत्रण रखूँ। न बहुत उत्तेजित होउं और न ही बहुत नर्वस। लेकिन अंदर तो कुछ और ही फीलिंग थी जब तक वजन नहीं ले लिया गया। लेकिन जब एक बार आपका वजन ले लिया जाता है तो थोड़ी देर आप आराम करते हैं। एक बार जब आप किट पहन लेते हैं तो फिर आपको न कुछ सुनाई देता है और न ही कुछ दिखाई देता है।”
उस दिन मल्लेशवरी ने 240 किलो वजन उठाया। स्नैच में 110 किलो और क्लीन और जर्क में 130 किलो, यानी अपने खुद के वजन से लगभग दोगुना। आखिरी लिफ्ट में उनके कोच ने उनसे 137 किलो वजन उठाने के लिए कहा।
मल्लेश्वरी याद करती हैं, “मैंने स्नैच में पहले 105, फिर 107 और फिर 110 किलो वजन उठाया। हंगरी की लड़की जो दूसरे नंबर पर आई, उसने भी उतना ही वजन उठाया। चीनी लड़की ने हमसे ढाई किलो वजन ज्यादा उठाया। फिर क्लीन एंड जर्क आया। उस समय आपको नहीं पता होता है कि आपके प्रतिद्वंदी कितना वजन उठा रहे हैं। लेकिन मेरे कोच को पता होता है कि उनकी और मेरी क्या क्षमता है। मेरे कोच ने मुझे पहले 125 किलो वजन उठाने के लिए कहा जबकि मैंने उनसे कहा भी था कि मुझे 127 किलो उठाने दीजिए। मैं ऐसी खिलाड़ी कभी नहीं रही कि कोच से बहस करूँ। जो कोच ने कह दिया वो मुझे हमेशा मान्य रहता है।”
'मैं मानती हूँ कि वो दिन मेरे लिए बुरा था'
मल्लेश्वरी आगे बताती हैं, “मेरी दूसरी लिफ्ट थी 130 किलो की। इस तरह की प्रतियोगिताओं में आखिरी लिफ्ट में ज्यादा से ज्यादा ढाई किलो या फिर बहुत हुआ तो पाँच किलो वजन बढाया जाता है। लेकिन मेरे कोच ने मुझसे 137 किलो वजन उठाने के लिए कहा। अगर मैं 132 किलो भी उठाती तब भी स्वर्ण पदक मेरा था। 135 भी उठाती तब भी गोल्ड मेरा था। 137 किलो उठाने की जरूरत ही नहीं थी। अगर मैं 132 किलो वजन उठाती तो हम तीनों के वजन बराबर होते। लेकिन चूँकि मेरा अपना वजन उन दोनों से कम था इसलिए स्वर्ण पदक मुझे ही मिलता।”
ऐसे में मल्लेश्वरी के कोच ने उनसे 137 किलो वजन उठाने के लिए क्यों कहा?
इसके जवाब में मल्लेश्वरी बताती हैं, “कुछ लोग कहते हैं कि ये उनका मिस-केल्कुलेशन था। वो शायद उनके लिए पदक सुरक्षित करना चाह रहे थे। लेकिन मैं नहीं मानती कि उन्होंने जानबूझ कर मेरा मेडल मिस कराया। मेरा तो मानना है कि उनका मुझ पर ज्यादा विश्वास था। ये ओलंपिक रिकार्ड था और उनका सपना था कि मैं ये रिकार्ड तोड़ूँ और मैं ये वजन 100 से ज्यादा बार भारत में उठा कर गई थी। मैं मानती हूँ कि वो दिन मेरे लिए बुरा था।”
मल्लेश्वरी उस दिन भाग्यशाली न रही हों लेकिन उस प्रतियोगिया को देख रहे नौरिस प्रीतम के लिए वो एक बड़ी बात थी। नोरिस ने बीबीसी को बताया, “जैसे ही मेडल आया, हम लोग तो उछल पड़े। मुझे सबसे ज्यादा अफसोस ये था कि वहाँ बहुत ज्यादा पत्रकार मौजूद नहीं थे। ज्यादातर भारतीय पत्रकार भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हाकी मैच देखने गए थे। मैं अगल बगल देख रहा था कि किस के साथ मिलकर इस सफलता को सेलेब्रेट करें। जैसे ही ये प्रतियोगिता खत्म हुई, मैं स्टेज पर गया। फिर मैंने प्रेस कांफ्रेंस अटेंड की जहाँ दुनिया भर के पत्रकार मौजूद थे। खुशी के कई सबब थे। एक तो ये कि मेडल आया और दूसरा ये कि एक लड़की का मेडल आया।”
मैंने कर्णम मल्लेश्वरी से पूछा कि जब आपके कोच ने आखिरी प्रयास में 137 किलोग्राम वजन उठाने के लिए कहा तो क्या आप झिझकी थीं? उनका जवाब था, “बिल्कुल नहीं। मेरे कोच की एक ही आवाज मुझे सुनाई दी थी कि तुम्हें ये करना है। मेरी क्लीन लिफ्ट जो थी वो बहुत ही आसानी से हुई थी, बिल्कुल पानी की तरह। कोई अगर सामने से देखता तो यही कहता कि ये इसके बाँए हाथ का खेल है। मेरा कोच नोट कर रहा था कि जैसे ही मैं अपना क्लीन लिफ्ट ले कर खड़ी हुई, चीन का कोच हताशा में नीचे बैठ गया। मेरा कोच चाह रहा था कि चीन की लड़की पहले वजन उठाए। उसने जब अपनी लड़की से 135 किलो उठाने के लिए कहा तो हमारे कोच ने मुझसे 137 किलो उठवाया।”
मल्लेश्वरी बताती हैं, “फिर चीनी कोच ने अपनी लड़की से 140 किलो वजन उठाने के लिए कहा। वो भी चाह रही थी कि पहले मैं वजन उठाऊँ। आप लोगों ने देखा होगा कि वो 140 किलो वजन फेंक कर आ गई क्योंकि इतना वजन उठाने की उसकी क्षमता थी ही नहीं। उसने हमारे कोच पर दबाव डालने की रणनीति बनाई जिसमें वो सफल रही। हमारे कोच उनके इस खेल को पकड़ नहीं पाए। चीनी लड़की 132 किलो से ज्यादा वजन उठा ही नहीं सकती थी, लेकिन वो हमें दबाव में डालने के लिए वजन बढ़ाते गए। हमारे कोच को भी लगा कि मैंने 137 किलो वजन पहले उठाया हुआ है। जोखिम क्यों ना उठाया जाए। अगर मैं ये वजन उठा लूँगी तो स्वर्ण पदक हमारा है। लेकिन मुझसे वो वजन गिर गया।”
इस प्रतियोगिता में चीन की ली विंग निन को स्वर्ण पदक और हंगरी की अरसेबेत मारकस को रजत पदक मिला। पदक की घोषणा होते ही पत्रकार नोरिस प्रीतम स्टेज पर चढ़ गए थे।
नौरिस याद करते हैं, “हम लोग प्रोटोकोल तोड़ते हुए ऊपर चढ़ गए थे। पुलिस ने हमें रोकने की कोशिश की लेकिन हम कहाँ मानने वाले थे। फिर उन्होंने भी ये सोचते हुए कि इतने दिनों बाद भारत का एक मेडल आया है तो उन्होंने ही सारे नियम ताक पर रख दिए। अब मुझे लगता था कि हमने मल्लेश्वरी को ही नहीं बाकी सभी भारोत्तोलकों को डिस्टर्ब किया था लेकिन ऐसे समय में भावनाओं पर नियंत्रण रखना बहुत मुश्किल हो जाता है।”