राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने सोमवार को ब्रिक्स को अलग-अलग देशों का 'मिला-जुला समूह' बताया और कहा कि इससे आसानी से कोई ठोस प्रस्ताव सामने नहीं आ सकता। उन्होंने दावा किया कि नई दिल्ली में हाल में संपन्न ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से सबसे ज्यादा फायदा चीन को हुआ।
पूर्व केंद्रीय मंत्री सिब्बल ने कहा कि ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहे भारत के लिए संयुक्त घोषणा तक पहुंचना होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने जैसा था। उन्होंने यहां एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, 'हमारे लिए यह होर्मुज से गुजरने जैसा था। चीन और रूस इसे पश्चिम विरोधी गुट के विकल्प के रूप में देखना चाहते हैं और आरआईसी (रूस, भारत, चीन) अब वास्तव में रूस, ईरान और चीन है... हम इसे पश्चिम विरोधी गुट नहीं बनाना चाहेंगे।'
क्या ब्रिक्स बन रहा पश्चिम विरोधी गठबंधन?
सिब्बल ने कहा कि भारत और दुनिया के अन्य देशों को यह पता चला है कि अमेरिका ईरान के खिलाफ युद्ध नहीं जीत पाएगा। उन्होंने कहा कि इसका असर घोषणा में भी दिखाई दिया, जिसमें फलस्तीन और दो-राष्ट्र सिद्धांत की चर्चा की गई। उन्होंने ब्रिक्स को 'मिश्रित समूह' बताते हुए कहा कि ऐसे समूह से आसानी से कोई ठोस प्रस्ताव सामने नहीं आ सकता।
सिब्बल ने कहा, 'इसीलिए मैंने शुरुआत में कहा था कि बिना किसी विवाद को जन्म दिए संयुक्त प्रस्ताव पारित होना हमारी सरकार की एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। मैं कहना चाहता हूं कि यह पश्चिम विरोधी गठबंधन नहीं हो सकता। इससे सबसे ज्यादा फायदा चीन को हुआ।'
नई दिल्ली घोषणापत्र को सिब्बल ने क्यों बताया उपलब्धि?
उन्होंने कहा कि नई दिल्ली घोषणापत्र में वैकल्पिक मुद्रा और डॉलर से अलग होने की बात नहीं की गई है और यह भी एक उपलब्धि है। सिब्बल ने कहा कि बिना किसी विवाद के संयुक्त बयान जारी होना भारत के लिए उपलब्धि रही। हालांकि, पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कई बार घोषणाएं केवल कागजों तक सीमित रह जाती हैं। ऐसे में यह समय ही बताएगा कि नई दिल्ली घोषणापत्र को जमीन पर लागू किया जाता है या नहीं।
ब्रिक्स का वार्षिक शिखर सम्मेलन रविवार को संपन्न हुआ। 11 प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले इस समूह के देशों की संयुक्त आबादी दुनिया की करीब 49.5 प्रतिशत है, जबकि वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में इनकी हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत है। शिखर सम्मेलन में लॉजिस्टिक्स आपूर्ति श्रृंखला, स्टार्टअप और संक्रामक रोगों पर नियंत्रण जैसे क्षेत्रों में प्रमुख नतीजे सामने आए। सदस्य देशों ने मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए बेहतर वैश्विक शासन और व्यापार व्यवस्था की भी मांग की।