2019 का गणित सबको परेशान कर रहा है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सिर में खुजली काफी बढ़ गई है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए 2019 लोहे के चने चबाने जैसा है। महागठबंधन के संभावित दलों के नखरे जहां राहुल का पैर का पसीना सिर पर चढ़ा रहे हैं, वहीं कई दल उन्हें भाव ही नहीं दे रहे हैं। उनकी नजर आज भी सोनिया गांधी ही नेता नंबर वन है।
कुछ ऐसा ही हाल अमित शाह का है। कोई खुश तो कोई नाराज। ऊपर से सामने खड़ा मुसीबतों का पहाड़। पहाड़ इसलिए उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड ने 2014 में थोक के भाव में सीटें पकड़ा दी थी। इस समय भी तकरीबन 190 सांसद इन्ही राज्यों हैं। यहां अब हाल बहुत अच्छा नहीं है।
बिहार में पार्टी की 22 सीटें हैं और 2019 में केवल 17 सीटों पर ही चुनाव लड़ेगी। महाराष्ट्र की दशा अच्छी नहीं है। पश्चिम बंगाल में वोट तो बढ़ेगा, लेकिन सीट का पता नहीं। कुछ ऐसा ही हाल उड़ीसा, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना का भी है। तमिलनाडु में सबकुछ स्टालिन के मूव पर निर्भर करेगा और कर्नाटक से उम्मीदें तो हैं, लेकिन कितनी फलीभूत होंगी कहा नहीं जा सकता। अब ऐसे में शाह सिर न खुजाएं तो क्या करें?
माया के नाज नखरे
मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण के समय की फोटो सबको याद होगी। खूब वॉयरल हुई थी। बसपा प्रमुख मायावती खुद सोनिया गांधी के पास गई, उनकी कमर में हाथ डाला और लिपट गई। सोनिया ने भी भरपूर मान दिया और मीडिया ने इस मिलन पर 2019 का रायता फैला दिया। अब वही माया हैं कि सोनिया के फोन करने पर लाइन पर नहीं आ रही हैं।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का भी फोन निरुत्तर रह जा रहा है। के. राजू के पांच-छह प्रयास फेल हो गए। गुलाम नबी आजाद भी नहीं समझ पा रहे हैं कि हुआ क्या है? संपर्क कराने के जादूगर अहमद पटेल ने लाइन तो जोड़ दी, लेकिन अभी कोई एनर्जी का आदान प्रदान नहीं हो रहा है। मायावती किसी कारण से कांग्रेस से नाराज हैं। एक तो उन्हें छत्तीसगढ़ में बसपा कारतूस मिस हो जाने के गम है तो दूसरा मध्य प्रदेश में भी कुछ खास हासिल नहीं हुआ।
राजस्थान में थोड़ी उम्मीद थी, लेकिन वह भी धरी की धरी रह गई। दरअसल, मायावती को उम्मीद थी कि तीनों में किसी भी राज्य में ढंग की हार से बसपा का राजनीतिक वजन बढ़ जाएगा। अब उन्हें लग रहा है कि यदि कांग्रेस हाई कमान ने थोड़ा साथ दिया होता तो ऐसा हो सकता था। लिहाजा वह नाराज हैं। इधर खबर है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी हाथी की सवारी का सपना देखना छोड़ दिया है। अगर माया मानी तो ठीक, नहीं तो आगे एकला चलो रे।
उत्तर प्रदेश में दिख रहा है 2009?
कांग्रेस पार्टी ने तीन राज्यों में सरकार क्या बनाई, उसके नेता ग्लाइडर पर सवार हो गए हैं। उन्हें 2019 में दस साल बाद का लोकसभा चुनाव 2009 दिखाई देने लगा है। पार्टी पूरे प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ने की दशा में 20-22 सीटें आने का सपना दिखाई देने लगा है। पार्टी के नेता मानकर चल रहे हैं अगड़ों के वोटों में वह बड़ा बंटवारा करेंगे। अन्य पिछड़ा वर्ग में अच्छी सेंध लगाएंगे। अल्पसंख्यकों का भरोसा मिलेगा। क्योंकि कांग्रेस ही इकलौती पार्टी है जो मोदी सरकार को सत्ता से हटाने के लिए मैदान में उतरेगी।
जनता में नवंबर 2016 में नोटबंदी के बाद से मोदी सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ी है। कामधंधा, रोजगार का संकट है। भाजपा सरकार के दावे हवा में तैर रहे हैं। 2017 में राज्य में गोवंश पर लगा प्रतिबंध भी किसानों का गुस्सा हर रोज चढ़ रहा है और किसान कर्जा माफ का संदेश उत्तर प्रदेश में अच्छी तरह से गया है। कहते हैं दिल बहलाने के लिए गालिब यह खयाल भी अच्छा है, लेकिन जरा सोचो पार्टी का संगठन कहां से लाओंगे? यह सवाल आते ही कांग्रेसी चुप्पी साध लेते हैं।
मंदिर तो कोर्ट बनवाएगा
केंद्र सरकार ने आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद का भ्रम दूर कर दिया है। दोनों मानकर चल रहे थे कि केंद्र और देश के 80 प्रतिशत हिस्सों में भाजपा की सरकार या प्रभाव है। इसलिए 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले राम मंदिर निर्माण की दिशा में दिखने वाली निर्णायक पहल हो जाएगी। मोदी सरकार और योगी सरकार ने अपनी तरफ से इस मुद्दे को ठोंक बजाकर देख लिया। कानूनी अड़चन भी देख ली और इसके बाद इस पर टाल मटोल का रुख अपनाया।
पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में एक लाख दीए की दीपावली का दांव चला, फिर भव्य राम की प्रतिमा की सौगात लेकर आए, लेकिन यह दोनों फुस्स हो गया। बताते हैं प्रधानमंत्री मोदी को इसका पहले से अनुमान था, इसलिए वह कभी भगवान राम का दर्शन करने अयोध्या नहीं गए। केंद्र सरकार के आखिरी साल में संघ और विहिप ने भाजपा सरकार को फिर राम मंदिर की याद दिलाई। पहले तो कुछ दिन राम मंदिर का माहौल बनाया गया और जब उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा रिटायर हो गए, तो केंद्र सरकार के संवाद की दिशा बदलने लगी।
अब केद्र सरकार ने करीब-करीब स्पष्ट कर दिया है कि राम मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने या आध्यादेश की पहल उच्चतम न्यायालय की मर्यादा के विपरीत होगी। मामला उच्चतम न्यायालय में है। अदालत को अपना काम करने दीजिए। बताते हैं सरकार के इस रुख से संघ के आला अधिकारियों के हाथ-पांव फूल रहे हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि स्वयंसेवक देश की भोली जनता के सवाल का क्या जवाब दें।
हीरो कौन, सिंधिया या पायलट?
कांग्रेस पार्टी के शीर्ष स्तर पर यह सवाल खूब घमासान मचा रहा है। जोतिरादित्य सिंधिया ने मध्य प्रदेश में तो सचिन पायलट ने राजस्थान में जान लड़ा दी। सचिन के करीबियों का मानना है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की इच्छा, एप से हुए सर्वे और समीकरण ने सबकुछ पायलट के पक्ष में कर दिया था, लेकिन वह अशोक गहलोत के तिकड़म और अहमद पटेल की तरकीब के आगे पस्त हो गए। इसके बाद सचिन ने दबाव बनाकर उपमुख्यमंत्री पद, अपने लोगों को मंत्री का पद और उनके विभाग, संगठन के नेतृत्व पर समझौता करके राजस्थान का रुख कर लिया।
वहीं, सिंधिया के करीबियों का मानना है कि वह दिग्गी राजा के बिछाए जाल में उलझ गए। अंत में दिल्ली में राहुल गांधी के साथ रहने में ही उन्होंने अपनी भलाई समझी। राहुल सिंधिया को मना भी रहे हैं। वह उन्हें कभी संगरीला के ओरिएंट में तो कभी कहीं और लंच डिनर पर ले जा रहे हैं। सिंधिया के पास कोई चारा भी नहीं है। वह अब अपने लोगों को मंत्री बनवाने और उन्हें अच्छा विभाग दिलानें के बाद नई योजना में लग गए हैं।
अभी समय और माया के सहारे हैं अखिलेश यादव
उत्तर प्रदेश में समीकरण बदला सा हुआ है। बसपा के साथ कांग्रेस गठबंधन चाहती है तो मायावती नाराज हैं। अखिलेश एक बार के लिए राहुल की नाराजगी तो मोल ले सकते हैं, लेकिन मायावती से नहीं। इसलिए मायावती की भाषा बोल रहे हैं। दूसरी तरफ चाचा शिवपाल भी अखिलेश की आंख में चुभ रहे हैं। नई पार्टी बना चुके शिवपाल फील्ड में काफी दौरा कर रहे हैं। शिवपाल ने अपना कनेक्शन दिल्ली में भी जोड़ लिया है। वह भाजपा से लेकर विपक्षी दलों तक में अपना संबंध बनाकर चल रहे हैं।
शिवपाल का यूपी में समाजवादी वोटों में एक हिस्सा तो है ही। सपा, बसपा, कांग्रेस से नाराज नेताओं की कमी नहीं है। कई ऐसे बाहुबली भी हैं जो शिवपाल का साथ देकर एकाध लोकसभा सीट जीत सकते हैं। इससे अखिलेश के कान खड़े हैं। अखिलेश को लग रहा है कि इसका गठबंधन में सीटों की हिस्सेदारी पर भी असर पड़ सकता है। फिलहाल वह चाचा राम गोपाल की एक सलाह पर अधिक जोर दे रहे हैं। चाचा राम गोपाल की सलाह है कि अभी अखिलेश शांत रहें। बयानों और संपर्क से राजनीतिक सक्रियता बनाए रखें। शेष सही समय आने पर। जय हो समाजवाद।
चिराग और तेजस्वी
तेजस्वी का तेज ही है जो लालू के कलेजे को ठंडक पहुंचा रहा है। बेटा राजनीति में तेज-तर्रार है। नेताओं से संबंध बनाने में भी माहिर है। अविवाहित है लेकिन उसके लिए अब अच्छे रिश्ते खूब आ रहे हैं। बस उसे बड़े भाई तेज प्रताप भाव नहीं देते। तेज प्रताप खुद को कृष्ण और तेजस्वी को अर्जुन बताकर रथ का सारथी मान बैठे हैं। तेज प्रताप को मना पाना लालू परिवार के बस की बात नहीं है। वह कभी भोला भंडारी बन जाते हैं तो कभी नए अवतार में आ जाते हैं। वहीं तेजस्वी का युवा नेताओं से रिश्ता बनाने में मास्टर हैं। वह राहुल गांधी काफी करीब आ रहे हैं।
लोजपा प्रमुख राम विलासवान के बैचलर बेटे चिराग पासवान से उनकी फोन पर अच्छी निभती है। चौधरी अजीत सिंह के बेटे जयंत चौधरी हों या शरद यादव के दामाद सब तेजस्वी के साथी हैं। बिहार में युवा नेताओं की वह एक मंडली तैयार करने में लगे हैं। सारी तैयारी 2019 में प्रधानमंत्री मोदी के आभामंडल और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बिहार में दमक रहे तेज को धूल धूसरित करने की है। तेजस्वी को यकीन है कि सही समय चिराग भी उनका साथ देंगे। आगे राम विलास जानें।