कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए तारिक अनवर ने बिहार में कांग्रेस को मजबूती दे दी है, वहीं कई कांग्रेसियों के लिए वह चुभता हुआ कांटा भी है। जब तारिक ने कांग्रेस छोड़ी थी तब वह कांग्रेस मुख्यालय के ताकतवर नेता थे। अल्पसंख्यक चेहरा तारिक 25 साल उम्र में ही कांग्रेस में आ गए थे। बिहार प्रदेश युवा कांग्रेस (आई), भारतीय युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष, बिहार प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके तारिक को कभी पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का स्नेह हासिल था।
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वह कांग्रेस पार्टी के कार्यवाहक अध्यक्ष रहे सीताराम केसरी के भी काफी करीब थे। 1999 में तारिक ने सोनिया गांधी का विरोध किया था और शरद पवार, पीए संगमा के साथ कांग्रेस छोड़ दी थी। वह शरद पवार की पार्टी एनसीपी में महासचिव थे, लेकिन पिछले महीने उन्होंने पवार को छोडक़र फिर कांग्रेस का दामन थाम लिया है। अभी कांग्रेस पार्टी में बड़े अल्पसंख्यक चेहरे के रूप में अहमद पटेल, गुलाम नबी आजाद हैं, लेकिन माना जा रहा है कि इन नेताओं के लिए कहीं न कहीं तारिक अनवर आंख की किरकिरी बन सकते हैं।
सीबीआई : बर्र के छत्ते में हाथ
केंद्र सरकार ने सीवीसी के कंधे पर बंदूक रखकर सीबीआई को छेड़ दिया। केंद्रीय सचिवालय में कुछ अफसर इसे बर्र के छत्ते में उंगली घुसेडने जैसा देख रहे हैं। अब यह मामला अदालत में है। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीवीसी मामले की जांच कर रहा है। मामला अदालत में है लेकिन बताते हैं सरकार के भी हाथ-पांव फूले हुए हैं।
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सरकार और भाजपा में भी इसको लेकर अलग-अलग राय है। ईडी, सीवीसी और सीबीआई भी बंटी हुई है। शीर्ष स्तर के कई अधिकारी और राजनेता राकेश अस्थाना के साथ हैं तो एक बड़ा खेमा आलोक वर्मा का पक्ष ले रहा है। कानून मंत्रालय के एक अफसर की माने तो कुछ ऑपरेशनल चूक हो गई है। बताते हैं सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना में काफी पहले से चल रही थी। दोनों केंद्र सरकार और सीवीसी में एक दूसरे की शिकायतें करके अपनी जोर अजमाइश कर रहे थे। इस जोर अजमाइश में राकेश अस्थाना काफी भारी पड़ रहे थे।
इस पूरे खेल में धीरे-धीरे एकाध और एजेंसियों के अफसर शामिल हो गए। मामला पेंचीदा होता गया। अब यह इस मोड़ पर आकर खड़ा हुआ है। जहां केंद्र सरकार, सीवीसी और सीबीआई के बीच में सुप्रीम कोर्ट आ गया है। मजे की बात यह है कि इस मामले में आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना दोनों को न्याय चाहिए। दोनों को न्याय देने के इस मामले में केंद्र सरकार और सीवीसी दोनों की छवि फंस गई है। वहीं, अंतरिम निदेशक एम नागेश्वर राव से जुड़े नये खुलासे भी हो रहे हैं। अब आप समझ सकते हैं कि यह समय सीवीसी और केंद्र सरकार दोनों के लिए कैसा है। वह भी तब जब पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के समय में आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजने के फैसले के पीछे राफेल लड़ाकू विमान सौदा की जांच जुड़ रही है।
राहुल गांधी मुस्कराए
दो महीने पहले तक राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी में चल रही उधेड़ बुन में काफी व्यस्त थे। उनसे लगातार मिलने वाले सूत्रों की माने तो राहुल काफी व्यस्त थे और उनके कंधे पर बोझ दिखाई पड़ रहा था। समय की कमी और चेहरे पर पार्टी को आगे ले जाने की चिंता साफ दिखाई देती थी। अब वह बात नहीं है। सूत्र बताते हैं कि राफेल लड़ाकू विमान जहां बिना ईधन के उड़कर विदेश तक पहुंच गया है, वहीं देश के हर शहर में इसकी चर्चा हो रही है।
राहुल गांधी को तब और सुकून मिलता है, जब उन्हें किसी जिले या प्रदेश का नेता बताता है कि अमुक जगह पर भी इसकी चर्चा है। राफेल के जरिए सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि पर अटैक हो रहा है। उत्तर प्रदेश के एक बड़े नेता ने भी यही जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अंबानी बड़े उद्योगपति हैं, लेकिन उनकी देश में छवि अच्छी नहीं है। ऊपर से प्रधानमंत्री का उनसे प्रेम। यह तो वही बात हुई कि करेला नीम के पेड़ पर चढ़ा। ऊपर से खुश होने की एक वजह और मिल गई है। सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को केंद्र सरकार ने सीवीसी की सिफारिश पर जबरिया छुट्टी पर भेज दिया। मामला कोर्ट में है। राहुल के पास इसको लेकर भी अच्छी खबरें आ रही हैं।
अभी तो ऐसे चलेगा, लेकिन बाद में सब ठीक होगा
बसपा में मायावती के बाद दो-तीन ही कद्दावर नेता हैं। एक नेता जी मिल गए। महागठबंधन और कांग्रेस के विरोध के सत्र पर मुस्करा दिए। फिर वह बोले राजनीति में मजबूरी से बड़ी कोई चीज नहीं होती। अभी स्थिति ऐसी ही है। साहब का कहना था कि कुछ समय तक ऐसे ही चलना है, लेकिन ऐसे नहीं चलते रहना है। समय आने दीजिए, बाद में सब ठीक होगा। यह पूछने पर क्या आगे महागठबंधन की संभावना है, तो बोल पड़े कि संभावना खत्म नहीं हुई है। लेकिन भविष्य का जवाब तो समय ही दे सकता है। इतना तय है कि हम सबका मकसद भाजपा को हर जगह से सत्ता से बेदखल करना है। उसकी सांप्रदायिक राजनिति को जड़ से उखाड़ फेंकना है। उन्होंने कहा कि समय देखकर वह भी खामोश हैं, लेकिन सभी विपक्षी दलों का उद्देश्य एक है। इसलिए अभी केवल इतना कहा जा सकता है कि इंतजार कीजिए। तेल और तेल की धार देखिए।
उपेन्द्र भाई : चित भी आपकी और पट भी
रालोसपा के उपेन्द्र कुशवाहा हैं। केंद्र सरकार में राज्यमंत्री हैं। पास में प्रभार भी स्कूली शिक्षा का है। राजनीति में मंझ गए हैं। विभाग की हालत तो यह है कि केंद्रीय विद्यालय में किसी छात्र को प्रवेश कराने के लिए केवल अनुरोध कर सकते हैं। रहा सवाल कामकाज तो फाइल दर्शन के लिए तरश जाते हैं। हा, पास में जाने पर चाय पिलाना, गप करना मूल काम भर रह गया है। साढ़े चार साल इसी में कट चुके हैं। अब चुनाव का समय है। कुशवाहा जी एनडीए का हिस्सा है। बिहार में रालोसपा के पास अच्छा खासा वोट है। अगर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पांच सीट दे दें तो कुशवाहा की शान रह जाएगी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुशवाहा को पसंद नहीं करते और उन्हें (कुशवाहा) पता कि मन माफिक सीटें मिल पाना टेढ़ी खीर है। इसलिए वह सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2019 में फिर प्रधानमंत्री बनवाते हैं और शाम को राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव से मिल आते हैं।
शरद पवार लाए नई बयार
एनसीपी के शरद पवार। मराठा राजनीति के सरदार कहे जाते हैं। पवार के राजनीतिक कौशल के बारे में आम है कि वह आसमान में उड़ती चिड़िया के पंख उसकी छाया से गिन लेते हैं। शायद ही कोई ऐसा प्रभावी राजनीतिक दल हो जहां-जहां शरद की पैठ न हो। पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी शरद पवार के पास राजनीति के गुर सीखने खूब जाते थे, इधर थोड़ा कम जा रहे हैं। पवार साहब तीन-चार महीने पहले तक महागठबंधन की जमीन तैयार में बड़े सहयोगी थे। उनकी भविष्यवाणी थी 2019 में कोई भी मुरारजी देसाई या इंद्र कुमार गुजराल जैसा व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री बन सकता है।
इधर वह राजनीति की नई गुगली फेंक रहे हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ की थी। हालांकि इसका पवार को खामियाजा भुगतना पड़ा। पार्टी कद्दावर नेता तारीक अनवर पार्टी छोड़ दिए थे। अब वह कह रहे हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष के राजनीतिक दलों का महागठबंधन हो पाना मुश्किल है। इस बारे में कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि वह पवार साहब है। समय को देखकर बोलते हैं। समय देखकर नई बयार ले आना उनके स्वभाव में रहा है।
यह बात तो मानने की है कि उन्होंने भाजपा में अनुशासन बनाया है। भाजपा के एक महासचिव का कहना है कि जम्मू-कश्मीर से कन्या कुमारी तक भाजपा एक राय, एक मत में है। वह (भाजपा अध्यक्ष अमित शाह) जहां जैसा चाहते हैं, स्थिति बना लेते हैं। उनका एकमात्र मकसद पार्टी को लगातार ऊंचाई पर ले जाना है और अपने कार्यकाल में उन्होंने ऐसा कर दिखाया है। बताते हैं मध्य प्रदेस और राजस्थान में उन्होंने संगठन को लेकर सफलता पा ली है। अब भाजपा अध्यक्ष के एजेंडे में टिकट का बंटवारा है।
बताते हैं अमित शाह खुद मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की एक-एक सीट का गुणा भाग कर रहे हैं। उनका मुख्य जोर प्रत्याशी की छवि, तैयारी, क्षेत्र में पैठ, कार्यकर्ताओं पर पकड़ को लेकर है। महासचिव को शाह का स्नेह प्राप्त है और उनका कहना है कि पार्टी ने तय कर लिया है। वह टिकट बंटवारे में पूरी पारदर्शिता बरत कर चल रहे हैं। रहा सवाल कहां क्या तो अमित शाह के मन में क्या चल रहा है, यह कोई नहीं जानता।
किरण चौधरी का फ्लाप शो
राहुल गांधी की इच्छा पर किरण चौधरी ने पानी फेर दिया। राहुल गांधी ने बड़ी उम्मीद के साथ किरण चौधरी को किसान रैली में जन समर्थन जुटाने का जिम्मा सौंपा था। अगर राहुल यह जिम्मेदारी भूपेन्द्र हुड्डा को देते तो किसान के मुद्दे पर जन प्रदर्शन का हिट होना तय था, लेकिन राहुल ने कुछ सोचकर किरण चौधरी को इस मोर्चे पर लगाया। यह रैली महाराष्ट्र के किसानों में पैठ रखने वाले नेता नाना फाल्गुन राव पटोले के कांग्रेस अध्यक्ष से चर्चा पर हो रही थी।
बताते हैं कि किरण चौधरी ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था, लेकिन लोग आए ही नहीं। भीड़ भी इतनी कम जुटी कि कांग्रेस अध्यक्ष भी वहां नहीं पहुंचे। नाना पटोले की मोदी सरकार की किसान विरोधी नीतियों को कोसने की इच्छा भी धरी की धरी रह गई। वहीं हुड्डा की बांछे खिल गई। क्योंकि इसी बहाने कांग्रेस को उनकी अहमियत का पता चल गया।