केंद्र की मोदी सरकार में कई मंत्रियों के हौसले पस्त चल रहे हैं। उन्हें अब अपनी प्रोफाइल और सरकार के जनता के बीच बनने वाले इकबाल में कोई खास तब्दीली नजर नहीं आ रही है। राम विलास पासवान समेत कई मंत्रियों के चेहरे पर चमक लौट आई है। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी काफी खुश चल रहे हैं। वहीं जूनियर से सीनियर बनने वाले कुछ मंत्रियों को लेकर अंदरखाने में खुसफुसाहट तेज हो गई है।
केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी एक बार फिर अपनी प्रोफाइल, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से रिश्ते, पार्टी के नेताओं से संवाद पर विशेष ध्यान दे रही हैं। ईरानी के अलावा केंद्रीय वित्त (प्रभार), रेल, कोयला मंत्री पीयुष गोयल से ईर्ष्या रखने वाले मंत्रियों की संख्या बढ़ रही है। निर्मला सीतारमण भी अपने सहयोगियों के निशाने पर हैं। वहीं कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुश रखने के लिए हर जतन करने वाले मंत्री के रूप में देखा जा रहा है।
पहले धोया और अंत में धो उठे
कांग्रेस पार्टी के एक पुराने महासचिव आजकल अपने घर पर आराम फरमा रहे हैं। उनके पास अब सोनिया गांधी, राहुल गांधी समेत किसी हाई कोटरी वाले नेता का फोन भी नहीं आता। वह मान बैठे हैं कि यह समय राजनीति से वनवास का है। थोड़ी उम्मीद की लौ 2019 में जिंदा हो सकती है। बात बनी तो ठीक नहीं तो राजनीति के अज्ञातवास की तरफ जाना पड़ सकता है। वह कहते हैं कि इसके लिए मन से तैयार भी हैं, लेकिन दशकों तक राजनीति में मझे नेता के लिए हर समय भारी पड़ रहा है।
वह एक तरफ खुद को माखन लाल फोतेदार बनता देख रहे हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के भीतर तमाम कमिया दिखाई पड़ रही हैं। सूत्र का कहना है कि राहुल ने संसद के मानसून सत्र में अपने मन माफिक सबकुछ तय किया, लेकिन मिला कुछ नहीं। सत्र के आरंभ में उन्होंने अविश्वास प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री मोदी जमकर को धोया और सत्र के आखिरी दिन में उपसभापति के चुनाव के दौरान पूरी पार्टी की धुलाई करा दी। अंत भला सो सब भला। अब आप समझ सकते हैं कांग्रेस पार्टी की नई और पुरानी पीढ़ी किस दौर में जी रही है।
शरद पवार के तुरुप का पत्ता
कांग्रेस पार्टी शरद पवार का नया अंदाज देख रही थी। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अक्सर उनके घर के रास्ते पर देखे जा रहे थे। पवार और सोनिया गांधी में संवाद भी बढ़ रहा था। इस नये बदलाव से कई कांग्रेस के चाणक्य खौफजदा थे तो कई उत्साहित। चाणक्यों को लग रहा था कि शरद पवार जल्द ही नई गुगली फेंक सकते हैं। राज्यसभा में कई के चेहरे तब खिल गए, जब कांग्रेस अध्यक्ष ने एनसीपी की वंदना चव्हाण को राज्यसभा में उपसभापति का उम्मीदवार बनाए जाने की मंजूरी दे दी।
लेकिन अचानक सब गश खा गए। जैसे ही पवार को पता लगा कि जनता दल (बीजू) के नवीन पटनायक साथ नहीं देने वाले, उन्होंने फौरन पार्टी के नेता प्रफुल्ल पटेल को सक्रिय कर दिया। पटेल ने यह कहने में जरा भी देर नहीं लगाई कि कांग्रेस पार्टी किसी दूसरे उम्मीदवार की तलाश कर ले। दरअसल शरद पवार बिना वजह अपने दल के प्रत्याशी की हार का ठीकरा अपनी छवि पर नहीं फोड़वाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कांग्रेस के नेताओं की दलील को भी खारिज कर दिया।
यह शरद पवार का ऐसा अंदाज था जो न कांग्रेस उगल पा रही है और न ही निगल। इसके बाद तो जो हुआ सब जानते हैं। विपक्षी एकता की कलई खुल गई। कांग्रेस के प्रत्याशी बीके हरिप्रसाद को वोट देने के लिए सहयोगी दलों के सांसदों ने ही किनारा करना शुरू कर दिया। यहां तक कि कभी राहुल गांधी की शान में कसीदे पढऩे वाले बेनी प्रसाद वर्मा भी राज्यसभा में मतदान के बाद संसद भवन पहुंचे। जया बच्चन ने भी कांग्रेस प्रत्याशी को वोट नहीं डाला।