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कानों देखी: रणनीतिकारों की भी नहीं सुन रहीं ममता दीदी, उधर राजनाथ ने भी लड़ाई मोल ली

Mon, 10 Jun 2019 10:20 PM IST
अमर शर्मा शशिधर पाठक, नई दिल्ली
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अमित शाह और ममता बनर्जी (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
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पश्चिम बंगाल में ममता दीदी ने टकराव के ही रास्ते को चुना है। ममता बनर्जी अपने रणनीतिकारों की भी कम सुन रही हैं। उन्हें सुना ज्यादा रही हैं। ममता का मानना है कि भाजपा के हिंदुत्व की राजनीति विभाजनकारी है। इसके विरोध पर तृणमूल अपना आधार बनाए रख सकती है। ममता के इस संकेत पर पार्टी के नेता और राज्यसभा सांसद ब्रायन समेत अन्य हर लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हैं, लेकिन तृणमूल के भीतर का एक बड़ा धड़ा इससे सहमत नहीं है। कई विधायक पार्टी के बड़े नेताओं से अपील कर रहे हैं कि अभी समय है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को टकराने की बजाय डैमेज कंट्रोल की तरफ लौटना चाहिए। ममता बनर्जी के पास सुधींद्र कुलकर्णी जैसे सलाहकार भी हैं, लेकिन बताते हैं कि संघर्ष की राजनीति से मुख्यमंत्री पद तक पहुंची ममता बनर्जी किसी कीमत पर हार मानने के लिए तैयार नहीं है। इस बारे में वह चंद्रबाबू नायडू समेत किसी दूसरे दलों के शुभचिंतकों की भी जरा कम सुन रही है। वहीं भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के चेहरे की मुस्कान लगातार बढ़ती जा रही है। विजयवर्गीय को लग रहा है कि दीदी ने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने की रफ्तार काफी तेज कर दी है। 

सरकारें गिराने की रणनीति से पीछे हटी भाजपा

मोदी सरकार-1 के समय में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कई राज्यों में सरकार को अपदस्थ करके भाजपा की सरकार बनवाने के लिए आपरेशन चलाया, लेकिन अब शाह इसके खिलाफ नजर आ रहे हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार दूसरी बार 303 सांसदों का प्रचंड बहुमत मिलने के बाद शाह ने भाजपा को तोड़-फोड़ वाली पार्टी के पहचान से बाहर निकालने का मन बनाया है। यह कैलाश विजयवर्गीय, भूपेंद्र यादव समेत कई उनके रणनीतिकारों को भी पसंद है। बताते हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंशा भांपकर ही भाजपा अध्यक्ष ने इसे उपयुक्त समझा है। अब किसी दल को सहानुभूति का लाभ नहीं लेने देना चाहते।
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अब एजेंडे में विरोधियों को कमजोर करना है। इस स्थिति तक लाने की कार्य योजना है कि जहां-जहां गैर भाजपा की सरकारें हैं, वहां उन दलों का दीन ईमान कमजोर हो जाए। भाजपा का मजबूत बेस बन जाए और चुनाव बाद पूर्ण बहुमत की सरकार बने। बताते हैं इसका सीधा फायदा एचडी कुमारस्वामी को कर्नाटक में और इसके बाद राजस्थान में अशोक गहलोत, फिर मध्य प्रदेश (म.प्र.) में कमलनाथ तथा पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को मिलने जा रहा है। 

मनोज सिन्हा को क्या मिलेगा?

मनोज सिन्हा - फोटो : अमर उजाला
मनोज सिन्हा को प्रधानमंत्री बहुत मानते हैं। मनोज सिन्हा गाजीपुर से चुनाव भले हार गए, लेकिन उन्हें परिणाम देने वाला, व्यवहार कुशल, प्रतिबद्ध नेता माना जाता है। बताते हैं शीर्ष नेतृत्व मनोज सिन्हा को उत्तर प्रदेश (उ.प्र.) में महेंद्र नाथ पांडे का उत्तराधिकार देकर भाजपा अध्यक्ष बनाना चाहता है। सिन्हा काबिल भी हैं। छात्र जमाने से राजनीति की है। हालांकि भूमिहार मनोज सिन्हा इस पेंचीदगी में पड़ने से बचना चाहते हैं। मनोज सिन्हा के लिए दूसरा रास्ता राज्यसभा के जरिए लुटियन जोन में बने रहना और पहले मंत्रिमंडल विस्तार में कैबिनेट में जगह पाना है।

माना जा रहा है कि उन्हें यह अवसर गुजरात से राज्यसभा सदस्य स्मृति ईरानी के इस्तीफा देने के बाद मिल सकता है। हालांकि भाजपा में तीन दावेदार और हैं। दो तो मार्ग दर्शक मंडल के सदस्य हैं। लालकृष्ण आडवाणी और डा. मुरली मनोहर जोशी। दोनों लुटियन जोन में रहना चाहते हैं। तीसरी पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी हैं। स्वराज ने जैसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चाहा था, उसके अनुरूप विदेश नीति का खाका तैयार करने में भूमिका निभाई है। देखिए आगे होता क्या है? 

क्या राजनाथ सिंह ने बड़ी लड़ाई मोल ले ली?

राजनाथ सिंह - फोटो : PTI
क्या राजनाथ सिंह ने बड़ी लड़ाई मोल ले ली। राजनीतिक गलियारे में चर्चा है कि रक्षा मंत्री ने अपनी आत्मरक्षा में एक बार फिर कदम उठाया। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी के बाद अधिकार संपन्नता के मामले में नेता नंबर दो के आसन पर अब भी अमित शाह ही विराजमान हैं। लेकिन राजनाथ ने साख बचाने के लिए कदम ही नहीं उठाया, दमखम भी दिखाया और अपने आवास पर संसदीय कमेटी की पहली बैठक बुलाई। इस बैठक में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी आए। कुछ मंत्री जैसे प्रकाश जावड़ेकर, निर्मला सीतारमण और थावर चंद गहलोत नहीं पहुंच सके। राजनाथ सिंह को मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के शुरुआती दिनों में भी दमखम दिखाना पड़ा था। बताते हैं तब भी संघ आगे आया था और इस बार भी आया। हालांकि मोदी सरकार-1 में राजनाथ सिंह पूरे साल तक इसकी कहीं न कहीं कीमत भी चुकाते रहे। 

हुआ दरअसल यह कि नई सरकार के गठन के बाद प्रधानमंत्री ने आठ कमेटियों के गठन को मंजूरी दी। इसमें अमित शाह सभी समितियों में थे और राजनीथ सिंह जैसा वरिष्ठ राजनीतिज्ञ केवल दो में। उनसे जूनियर मंत्री भी आगे निकल गए थे। संसदीय समित और राजनीतिक मामलों की समिति में भी उनका नाम नदारद था। बताते हैं इसे क्षत्रिय शिरोमणि ने अपमान की तरह लिया। आरएसएस के दरवाजे पर गुहार लगाई और कहा कि यदि उन्हें वह (मोदी-शाह) नहीं चाहते तो सांसद के तौर पर ही ठीक हैं। यानी इस्तीफा देने तक का प्रस्ताव रख दिया।

इसके बाद संघ प्रमुख भागवत के कहने पर भैय्या जी जोशी ने प्रधानमंत्री से चर्चा की और तब आनन-फानन में गलती सुधारी गई। संसदीय समिति का अध्यक्ष अमित शाह के स्थान पर राजनाथ सिंह को बनाया गया। राजनाथ ने भी लगे हाथ अपना दमखम दिखाने के लिए समिति की पहली बैठक का कोरम अपने निवास पर ही करने का मन बना लिया। जबकि कायदे से यह संसद भवन के एनेक्सी में होती तो परंपरा के अनुरूप रहता। पहले कार्यकाल में भी यही हुआ था। तब अरुण जेटली अहम बैठक के लिए राजनाथ के घर पर आए थे। 

मायावती को राम राम भजना है 

मायावती - फोटो : एएनआई
कोई चाहे तो पूछ ले। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव के बसपा द्वारा गठबंधन तोड़ने का ऐलान करने से कोई परेशानी नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल को ईडी से सम्मन जाने पर भी कोई हैरानी नहीं है। क्योंकि जो शरद पवार एनसीपी के कांग्रेस में विलय तक की बात कर रहे थे, थोड़ा ठहर गए हैं। राष्ट्रीय लोकदल के एक नेता का कहना है कि चुनाव चल रहा था और बीच में ही चीनी मिल मामले में एफआईआर दर्ज हो गई। वह तभी समझ गए थे कि गाड़ी कहां जा रही है।

सबका इशारा है कि ऐसा करके बसपा को घुटनों के बल बैठा दिया है। मतलब साफ है कि न लोकसभा और न ही राज्यसभा। न ही कोई उपचुनाव और न विधानसभा चुनाव। कहीं विपक्षी एकता का कोई सीन नहीं है। क्योंकि सब लालू प्रसाद यादव तो हैं नहीं कि रिम्स में भी जलालत झेल लेंगे। आगे सारी राजनीति अपने दम पर होगी। फिर मायावती को राम राम भजना है और मुलायम चाहे जितनी कोशिश कर लें लेकिन अखिलेश और शिवपाल को भी नया राग गाना ही है। देखिए आगे राह किधर जाती है। 
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कांग्रेस राजनीतिक कौशल की अग्निपरीक्षा 

सोनिया गांधी और राहुल गांधी - फोटो : PTI
सबसे पुरानी पार्टी का सबसे मुश्किल दौर माना जा रहा है। कांग्रेस के एक पूर्व महासचिव का कहना है कि जब कुबुद्धि आ जाती है तो अपने आप सब हो जाता है। हम अब सब गवां चुके हैं। जो बचा है, उसे भी कमजोर होते देखना है। कुपित कांग्रेसी नेता फिर भी चुप हैं, क्योंकि वह अंतिम सांस कांग्रेस के झंडे में लिपटकर लेना चाहते हैं। सूत्र का कहना है कि पूरे उत्तर भारत से हम साफ हो गए और हमारे अध्यक्ष जी दक्षिण भारत में केरल बचाने में जुटे हैं। न जाने पार्टी क्या संदेश देना चाह रही है। कई प्रदेश में पार्टी को नेतृत्व नहीं मिल रहा है। उ.प्र. के 35 से अधिक जिलों में कांग्रेस का अध्यक्ष नहीं है। प्रदेश इकाई नाम मात्र की है। 10 दिन बाद से संसद में बजट सत्र है, पूरे देश में पार्टी के भीतर हार की खीझ है, महाराष्ट्र, झारखंड, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, असम विधानसभा के चुनाव होने हैं। बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं और हम हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। स्थिति तो यह है कि कांग्रेस अध्यक्ष से मिलना भी एक चुनौती है। 

राहुल गांधी क्यों गहलोत से नहीं मिल रहे हैं 

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की दुविधा बढ़ रही है। वह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मिलना चाहते हैं। समय मांग रहे हैं, लेकिन गांधी का कार्यालय उन्हें समय नहीं दे रहा है। लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद राहुल गांधी ने जिन नेताओं पर निशाना साधा था, उनमें म.प्र. के सीएम कमलनाथ और चिदंबरम के साथ गहलोत भी थे। कमलनाथ और चिदंबरम के बेटे अपना लोकसभा चुनाव जीत गए हैं। गहलोत का बेटा हार गया है। ऊपर से राहुल गांधी मिल नहीं रहे हैं। यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा अभी गहलोत का दर्द कम नहीं कर पा रही हैं। उधर उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट लगातार अपने तेवर में हैं। यही हाल पंजाब का है। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सिद्धू का पर कतर दिया है और सिद्धू तुगलक लेन की क्यू में हैं। 
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