कन्हैया कुमार-गिरिराज सिंह (फाइल फोटो)
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बड़बोले गिरिराज के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई हैं। साढ़े चार लाख भूमिहार बाहुल बेगूसराय में भूमिहार गिरिराज के खिलाफ गौतम गोत्र का भूमिहार कन्हैया कुमार मुसीबत बन गया है। दूसरी मुसीबत गिरिराज के तमाम बयान उनका पीछा कर रहे हैं।
बताते हैं गिरिराज को चुनाव प्रचार में कोई न कोई पाकिस्तान भिजवाने का टंट भी कस दे रहा है। हालांकि महागठबंधन का अल्पसंख्यक प्रत्याशी गिरिराज के लिए थोड़ी सी राहत भरी खबर है, लेकिन उन्हें अल्पसंख्यकों के मैच फिक्स कर लेने का खतरा भी साफ दिखाई दे रहा है। अल्पसंख्यक भी गिरिराज के बड़बोले पाकिस्तानी बयानों से खीझे हैं।
गीतकार जावेद अख्तर समेत तमाम पहले ही कह चुके हैं कि इस बार समाज कन्हैया की तरफ देखें। बताते हैं गिरिराज को पहले इसका इल्म हो गया था। वह अमित शाह की शरण में गए तो उन्हें ढाढस बंधाकर भेजा गया, लेकिन पुराने भाजपा सांसद की बहू और उनका परिवार भी साथ दे रहा है। भाजपा ने धन, दौलत, प्रचार तंत्र सब झोंक दिया है।
कन्हैया कुमार ने चंदे के रकम, बुद्धिजीवियों के सहयोग, जनता के साथ की ताकत झोंक दी है। दर्जन भर राज्यों के सैकड़ो युवा, एनजीओ, नुक्कड़ नाटक मंडली, जेएनयू प्रचार का वामपंथी विंग सबने डेरा डाल दिया। मानो राष्ट्रवाद और असली हिंदुस्तान, पाकिस्तान का चुनाव वहीं हो रहा हो। कन्हैया कुमार की टीम आजादी के थीम सांग पर नारा भी लगा रही है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक प्रमुख मोहन भागवत बाबा क्या बोल गए? उनकी बोली लोकसभा चुनाव-2019 में कुछ नेताओं को गोली की तरह लग रही है। ठीक वैसे ही जैसे बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान वह बोले थे और लालू के मोर्चा संभालते ही भाजपा का प्रचार अभियान भरभराकर गिरने लगा था।
भागवत बाबा विज्ञान भवन में बोले, फिर राम मंदिर पर बोले, संघ का मन परिवर्तन करते हुए धर्मनिरपेक्षता की सॉफ्ट लाइन ले ली। थोड़ी वसुंधरा, थोड़ा शिवराज किए और पांच राज्यों के चुनाव नतीजे ने पस्त कर दिया। अब वह फिर बोले हैं। पहले ग्वालियर में प्रांत प्रचारकों की बैठक में बोले थे। अब नागपुर में स्वयंसेवको को संबोधित करते हुए बोले हैं।
भागवत बाबा ने स्वयंसेवकों से कहा कि वह सरकारों से बड़ी उम्मीद न पालें। पहले सरकारें लंबे समय तक(-30-40साल) तक चलती थी। अब इनका कार्यकाल छोटा(पांच साल) हो रहा है। ग्वालियर में संघ ने बताया था कि भाजपा के पास अपना राजनीतिक संगठन है। उसे अपना काम करने दिया जाए। स्वयंसेवक बहुत उम्मीद न पालें।
भाजपा नेता इसे बड़ी बारीकी से सुन रहे हैं। मोदी सरकार के एक कैबिनेट मंत्री से इसको लेकर चर्चा हो रही थी तो उन्होंने अपने एक सहयोगी मंत्री पर तंज किया। कहा भागवत जी ने क्या कहा, हम नहीं जानते, लेकिन हमारे एक सहयोगी इन दिनों चुप-चुप से हैं।
केंद्रीय रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा
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दूरसंचार मंत्री मनोज सिन्हा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सीधा सानिध्य प्राप्त है, लेकिन सिन्हा की टीम को समझ में नहीं आ रहा है कि उनका खेल किसने बिगाड़ा। सिन्हा चाहते थे कि सुहेलदेव पार्टी के ओम प्रकाश राजभर का भाजपा के साथ गठबंधन बना रहे। गाजीपुर में करीब डेढ़ लाख राजभर मतदाता हैं। भूमिहार भी बहुत हैं, लेकिन परिसीमन के बाद दो लाख से अधिक भूमिहार बलिया संसदीय सीट में चले गए।
अब गाजीपुर में यादव मतदाता काफी हैं। अल्पसंख्यक अंसारी परिवार गाजीपुर में अच्छी पकड़ रखता है। कुल मिलाकर उ.प्र. के मुख्यमंत्री पद के करीब तक पहुंच चुके मनोज सिन्हा की सीट पेंचीदगी में फंस गई है। कारण साफ है कि मुकाबले में गठबंधन लड़ रहा है। सपा और बसपा के वोट साथ हैं। अफजाल अंसारी ताल ठोंक रहे हैं। जबकि गाजीपुर में जितना विकास का काम मनोज सिन्हा ने कराया है उतना कई दशकों में कुछ पूर्वजों ने मिलकर नहीं किया है।
भाजपा प्रत्याशी स्मृति ईरानी
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संसद भवन में बसपा प्रमुख मायावती के चरणों में अपना सिर काटकर रख देने का प्रस्ताव देने वाली मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी अमेठी में कड़ी मेहनत कर रही हैं। वह इस बार कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को हराने का दावा कर रही हैं। ईरानी ने इसके लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा रखा है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हर संभव मदद कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को पहले ही अमेठी के लिए विशेष रणनीति के बाबत ताकीद कर रखा है। इधर कांग्रेस अध्यक्ष और प्रियंका गांधी की टीम को अमेठी में अपने होमवर्क पर भरोसा है। कांग्रेस के नेता अमेठी को गांधी परिवार की विरासत बताकर सहेजने की रणनीति तैयार कर रही है।
पार्टी के नेता अब हवा दे रहे हैं कि राहुल के वायनाड जाने, अमेठी की सीट छोड़ने की दशा में प्रियंका यहां की कमान संभाल सकती हैं। बताते हैं स्मृति ईरानी इस संभावना को भी संभव मान रही हैं। इसलिए उन्होंने राहुल के साथ-साथ प्रियंका पर हमला बढ़ा दिया है। क्या पता, एक उपचुनाव भी लड़ना पड़े?
बड़ा सस्पेंस है। अमित शाह ने उ.प्र. में भाजपा 74, देश में 300 पार का नारा दिया है। भाजपा के नेता इससे इत्तेफाक नहीं रखते। कांग्रेस के नेता तो 200 के नीचे भाजपा को जोड़ रहे हैं। खुद को 150 पार करा देते हैं। भाजपा कांग्रेस को 100 के नीचे 50 के ऊपर ले आ रहे हैं।
दिलचस्प बात यह कि कुछ तो कांग्रेस को उ.प्र. में आठ सीटें तक दे रहे हैं। जबकि देश का मतदाता खामोश है। सर्वे में जुटी तमाम ऐजेंसियों के सूत्र पर आइए। कानपुर के दो युवा चुनाव की समीक्षा में पूरी टीम के साथ लगे हैं। उनका मानना है कि भाजपा घटेगी, कांग्रेस कुछ पाएगी, गठबंधन ठीक-ठाक रहेगा। कुल मिलाकर घाटा भाजपा को होना है। लेकिन वह भी साफ कुछ नहीं कह पा रहे हैं।
बताते हैं मुद्दों से भटकाव के कारण मतदाताओं ने सन्नाटा खींच लिया है। फ्लोटिंग वोट वाले मतदाता भी चुप्पी साधे हैं। यह स्थिति यूपी की ही नहीं, पूरे देश में है। बताते हैं इसके कारण राजनीतिक दल बार-बार, लगातार सर्वे करा रहे हैं। हम तो कहते हैं भईया यही लोकतंत्र है। जय हो लोकतंत्र की और जय मतदाता तेरी।