भाजपा के नेताओं के मुंह से पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष की दौड़ में जेपी नड्डा सबसे आगे चल रहे हैं। नड्डा प्रधानमंत्री मोदी को भी प्रिय हैं। मिलनसार, विनम्र, वैकल्पिक तरीके से सोचने और सबकी सुनने वाले नड्डा को लेकर अमित शाह को भी कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि नाम तो शाह के करीबी, प्रमुख चुनौतियों को संभालने वाले भूपेंद्र यादव और कैलाश विजयवर्गीय का भी चल रहा है। खैर, भाजपा के संविधान के अनुसार अभी बनना कार्यकारी अध्यक्ष ही है। यही कार्यकारी अध्यक्ष बाद में भाजपा अध्यक्ष बनेगा। यह ऐलान भी एक सप्ताह के भीतर होने की उम्मीद है।
इसके साथ-साथ उत्तर प्रदेश (उ.प्र.) भाजपा अध्यक्ष की भी बारी है। महेंद्र नाथ पांडे केंद्र में मंत्री बन चुके हैं। उनकी जगह लेने के लिए लखनऊ से दिल्ली तक की जोर अजमाइश चल रही है। उ.प्र. के एक बड़े नेता का कहना है कि राज्य को नया अध्यक्ष ब्राह्मण मिलेगा तो जातीय संतुलन बना रहेगा। एक लॉबी पिछड़ा वर्ग से अध्यक्ष चाहती है।
हालांकि तय भाजपा अध्यक्ष, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और नरेंद्र मोदी को करना है। देखिए किसके हाथ बाजी लगती है। वैसे रमापति राम त्रिपाठी को भी एक बार लोग अध्यक्ष पद का दावेदार मानकर चल रहे हैं। त्रिपाठी केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के प्रिय हैं और पहले उ.प्र. भाजपा अध्यक्ष रह चुके हैं। संगठन की बारीकियों को भी समझते हैं।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लोकसभा चुनाव-2019 में मिली हार से ऊबर नहीं पा रहे हैं। दफ्तरी सूत्रों के अनुसार दिनचर्या में वह सामान्य नहीं हो पा रहे हैं। राहुल गांधी अभी यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि चूक हुई तो कहां? राहुल की तरह ही प्रियंका को भी इस तरह का नतीजा आने की उम्मीद नहीं थी। अमेठी के नतीजे भी काफी परेशान कर रहे हैं। यह भी नहीं समझ में आ रहा है कि अमेठी में आगे क्या किया जाए। राहुल और प्रियंका के कार्यालय में दिन रात एक करने वाले लोग लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे को हजम नहीं कर पा रहे हैं।
संदीप, प्रीती, धीरज सब खामोश हैं। जुबेर खाम अमेठी की खाक छान रहे हैं। राहुल के कैप में अलंकार सवाई, निखिल अल्वा सबके चेहरे पर एक सन्नाटा है। रोहन गुप्ता को नहीं पता कि सोशल मीडिया में असर क्यों नहीं दिखा। कई को अब दिव्या स्पंदना की स्टाइल भी समझ में नहीं आ रही है। संसद का बजट सत्र भी सिर पर है। 16 जून से शुरू होना है। सब हार की खीझ मिटाने में व्यस्त हैं। बताते हैं ऐसे में यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने कमान संभाल रखी है।
आप कह सकते हैं कि उ.प्र. के विपक्षी राजनीतिक दलों के पास यह एक अवसर है। वह चाहे तो अपनी खीझ को कुछ हद तक खुशी में बदल सकते हैं। लोकसभा चुनाव के बाद उ.प्र. की कुछ 11 सीटों पर विधानसभा चुनाव होना है। बसपा के एक नेता का सुझाव है कि यदि विपक्ष एकजुट होकर इनमें आठ सीट पर भी भाजपा के उम्मीदवार को हरा दे तो एक ढंग का संदेश चला जाएगा।
लेकिन चुनाव में हार से बिलबिलाई बसपा के नेता अपनी बात रखने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि ऐसा सपा-बसपा-कांग्रेस-रालोद में एक तालमेल से ही संभव है। इधर वह अपना तर्क दे रहे थे कि दूसरी तरफ मायावती ने उपचुनाव में सभी सीटों पर चुनाव में अकेले जाने का ऐलान कर दिया है। हालांकि इसके बाद भी सूत्र का कहना है कि चुनाव तो अभी होने नहीं जा रहे हैं। इसमें समय है। तब तक क्या जाने सदबुद्धि आ जाए।
शरद पवार, सुप्रीया सूले
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कहते हैं धमनियों में रक्त का प्रवाह जब मंथर होता जाता है तो व्यक्ति के पास विवेक का ही सहारा रह जाता है। इस समय मराठा सरदार कहे जाने वाले शरद पवार की यही स्थिति है। लोकसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना के अभूतपूर्व प्रदर्शन से सरकार भी चिंतित हैं। उनकी चिंता का एक बड़ा कारण अपनी पार्टी एनसीपी में दिखाई दे रही चिनगारी है। एक तो शक्ति क्षीण और ऊपर से चिनगारी सच में लक्षण कुछ अच्छे नहीं है।
मराठा सरदार बेटी सुप्रिया सूले को धीरे-धीरे वारिस के तौर आगे करते चले जा रहे हैं। लेकिन यह परिवार के ही लोगों को हजम नहीं हो रहा है। उनके रणनीतिकार सहयोगी प्रफुल्ल पटेल का दांव भी ढंग से काम नहीं कर पा रहा है। बताते हैं ऐसे में शरद पवार जल्द ही कोई बड़ा कदम उठा सकते हैं। वह चाहते हैं कि कुछ ऐसी पहल की जाए, जिसमें विरासत और सम्मान दोनों बचा रहे।
भाजपा के एक धड़े को इसकी परवाह नहीं है। अमित शाह का करीबी धड़ा भी आकलन कर रहा है कि बिहार में अगले साल प्रस्तावित विधानसभा चुनाव में आसानी से भाजपा की सरकार बन सकती है। बताते हैं लोकसभा चुनाव-2019 के नतीजे ने भाजपा को उत्साह से भर दिया है। भाजपा ने उ.प्र. में भी बाजी मार ली है और उत्तर के आठ राज्यों में परचम फहराया है। जद(यू) के पारखी नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस आहट को बखूबी भांप रहे हैं। उन्हें सीट बंटवारे से लेकर सबकुछ सपने में दिखाई दे रहा है। इसलिए वह एक नई राजनीति का जाल बुनने में लग गए हैं।
केंद्र की सरकार को बाहर से समर्थन देने का नीतीश कुमार का निर्णय इसी नजरिए से देखा जा रहा है। नीतीश कुमार पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी काफी भरोसा करते हैं। नीतीश को पता है कि राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव के पास विकल्प सीमित है। इसलिए भाजपा को आंख दिखा सकते हैं। जबकि भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री इस तरह की राजनीति पर बहुत भरोसा नहीं करते। उनकी नजर में एक न एक दिन बिहार में भाजपा की सरकार भी है। देखिए आगे होता है क्या।
क्या उद्धव ठाकरे के हाथ दूसरी लॉटरी लगेगी? क्या भाजपा महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में आधी सीट पर लड़ेगी और आधी शिवसेना के पाले में जाएगी। यानी 288 सदस्यीय विधानसभा की 135 सीट पर भाजपा और 135 सीट पर शिवसेना लड़ेगी? हो चाहे जो लेकिन महाराष्ट्र के मंत्री चंद्रकांत पाटिल ने इस संभावना को हवा दे दी है।
हालांकि भाजपा नेताओं का कहना है कि महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने में अभी समय है। इससे पहले मानसून आएगा और मुंबई में जोरदार बारिश होगी। भाजपा के महाराष्ट्र से जुड़े एक अन्य नेता कहना है कि हो चाहे जो चुनाव बाद मुख्यमंत्री भाजपा का ही होगा। देवेंद्र फडणवीस फिर सीएम बनेंगे। हां शिवसेना को उपमुख्यमंत्री का पद दिया जा सकता है।
हरियाणा के पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा, उनके पुत्र दीपेंद्र हुड्डा चुनाव हार गए। वह भी जाट बाहुल सीटों से। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के गैर जाट समीकरण ने काम किया और दोनों हुड्डा निबट गए। यह खबर भाजपा से ज्यादा कुछ कांग्रेस के नेताओं को खुशी दे रही है। कांग्रेस के मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला को भी खराब नहीं लग रही है। अशोक तंवर को भी लग रहा है कि एक प्रतिस्पर्धी निबट गया।
इसी साल हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने हैं। कांग्रेस पार्टी के चार चेहरे सीएम की रेस में खुद को लेकर चल रहे हैं। कु. शैलजा भी एक अवसर की तरह देख रही हैं। ऐसे में पिता पुत्र हुड्डा चुनाव हार जाएं तो पार्टी के अंदरुनी विरोधियों को इसमें बुरा क्या लगना।
ये पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह हैं। वास्तव में कैप्टन। पूरी धोबिया पछाड़ राजनीति करते हैं। कैप्टन चित और पट दोनों अपनी जेब में रखते हैं। विरोधियों की बिना परवाह किए प्यार से उन्हें निबटा देते हैं। चाहो तो प्रताप सिंह बाजवा और राजिंदरकौर भट्ठल से पूछ लो। प्रताप सिंह बाजवा तो आजकल पंजाब की बजाय ज्यादातर समय दिल्ली में कांस्टीट्यूशन क्लब में बने जिम को दे रहे हैं। सेहत का अच्छा ख्याल कर रहे हैं। नवजोत सिद्धू भी कैप्टन की कप्तानी से हार मान चुके हैं।
बताते हैं कि कैप्टन रौ में होते हैं तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से अपने तरीके से बात करते हैं। कैप्टन ही ऐसे नेता हैं जिन्होंने लोकसभा चुनाव में पंजाब से कांग्रेस को खुश होने वाला परिणाम दिया है। लिहाजा कैप्टन के नाम पर दिल्ली का कांग्रेस हाई कमान भी कान में तेल डाल लेता है। कोई चाहे तो इसे आशा कुमारी से पूछ सकता है।