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कानों देखी: बंगाल में दीदी को छकाएगी भाजपा

Tue, 04 Jun 2019 07:38 PM IST
शशिधर पाठक शशिधर पाठक, नई दिल्ली
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कैलाश विजयवर्गीय-ममता बनर्जी
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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भाजपा ने छकाने का निर्णय लिया है। कानों से देखने पर पता चला है कि पश्चिम बंगाल के प्रभारी और भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय यही चाहते हैं। विजयवर्गीय ममता बनर्जी को किसी तरह की सहानुभूति का लाभ भी नहीं लेना देना चाहते। इसलिए वह भाजपा के पश्चिम बंगाल के अध्यक्ष दिलीप घोष समेत अन्य की राय से सहमत नहीं हैं कि पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए। विजयवर्गीय चाहते हैं कि ममता बनर्जी के सामने जय श्री राम का नारा लगता रहे। आक्रामक ममता भड़कती रहें और उनके विधायक, पार्टी के कार्यकर्ता तृणमूल को छोड़कर भाजपा में आते रहें। इस तरह से ममता बनर्जी खुद ही कमजोर होती चली जाएंगी और 2021 में पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनने की संभावना दिखाई देने लगेगी। खबर है कि कैलाश विजयवर्गीय की यह राय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष दोनों को रास आ रही है। 

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येदियुरप्पा जी शराफत दिखाइए 

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के खेवनहार बने बीएस येदियुरप्पा की मुहिम को तगड़ा झटका लगा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दोनों कर्नाटक में अब ऑपरेशन लोटस के पक्ष में नहीं हैं। बताते हैं वहां एचडी कुमारस्वामी सरकार को गिराने की कोशिशों से अब भाजपा के शीर्ष नेताओं को कोई फायदा होता नजर नहीं आ रहा है। वैसे भी लोकसभा चुनाव में कर्नाटक में भाजपा ने बेहतर प्रदर्शन किया है। इसलिए एचडी कुमारस्वामी की सरकार गिराकर भाजपा बिना वजह की कोई सहानुभूति नहीं देना चाहती। शीर्ष स्तर के नेताओं का मानना है कि एक दिन अपने आप एचडी कुमारस्वामी की सरकार गिर जाएगी। इसके लिए कोई कोशिश करके अपने हाथ काले करने से कोई फायदा नहीं है। अब येदियुरप्पा हैं कि उन्हें हर रोज मुख्यमंत्री बनने के सपने आ रहे हैं। देखिए आगे होता है क्या? 

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नड्डा तो दिल्ली में, उ.प्र. में भाजपा अध्यक्ष पर कौन?

जेपी नड्डा (फाइल)
भाजपा के नेताओं के मुंह से पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष की दौड़ में जेपी नड्डा सबसे आगे चल रहे हैं। नड्डा प्रधानमंत्री मोदी को भी प्रिय हैं। मिलनसार, विनम्र, वैकल्पिक तरीके से सोचने और सबकी सुनने वाले नड्डा को लेकर अमित शाह को भी कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि नाम तो शाह के करीबी, प्रमुख चुनौतियों को संभालने वाले भूपेंद्र यादव और कैलाश विजयवर्गीय का भी चल रहा है। खैर, भाजपा के संविधान के अनुसार अभी बनना कार्यकारी अध्यक्ष ही है। यही कार्यकारी अध्यक्ष बाद में भाजपा अध्यक्ष बनेगा। यह ऐलान भी एक सप्ताह के भीतर होने की उम्मीद है। 

इसके साथ-साथ उत्तर प्रदेश (उ.प्र.) भाजपा अध्यक्ष की भी बारी है। महेंद्र नाथ पांडे केंद्र में मंत्री बन चुके हैं। उनकी जगह लेने के लिए लखनऊ से दिल्ली तक की जोर अजमाइश चल रही है। उ.प्र. के एक बड़े नेता का कहना है कि राज्य को नया अध्यक्ष ब्राह्मण मिलेगा तो जातीय संतुलन बना रहेगा। एक लॉबी पिछड़ा वर्ग से अध्यक्ष चाहती है।

हालांकि तय भाजपा अध्यक्ष, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और नरेंद्र मोदी को करना है। देखिए किसके हाथ बाजी लगती है। वैसे रमापति राम त्रिपाठी को भी एक बार लोग अध्यक्ष पद का दावेदार मानकर चल रहे हैं। त्रिपाठी केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के प्रिय हैं और पहले उ.प्र. भाजपा अध्यक्ष रह चुके हैं। संगठन की बारीकियों को भी समझते हैं। 

राहुल बाबा क्या करें?

राहुल गांधी - फोटो : पीटीआई
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लोकसभा चुनाव-2019 में मिली हार से ऊबर नहीं पा रहे हैं। दफ्तरी सूत्रों के अनुसार दिनचर्या में वह सामान्य नहीं हो पा रहे हैं। राहुल गांधी अभी यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि चूक हुई तो कहां? राहुल की तरह ही प्रियंका को भी इस तरह का नतीजा आने की उम्मीद नहीं थी। अमेठी के नतीजे भी काफी परेशान कर रहे हैं। यह भी नहीं समझ में आ रहा है कि अमेठी में आगे क्या किया जाए। राहुल और प्रियंका के कार्यालय में दिन रात एक करने वाले लोग लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे को हजम नहीं कर पा रहे हैं।
संदीप, प्रीती, धीरज सब खामोश हैं। जुबेर खाम अमेठी की खाक छान रहे हैं। राहुल के कैप में अलंकार सवाई, निखिल अल्वा सबके चेहरे पर एक सन्नाटा है। रोहन गुप्ता को नहीं पता कि सोशल मीडिया में असर क्यों नहीं दिखा। कई को अब दिव्या स्पंदना की स्टाइल भी समझ में नहीं आ रही है। संसद का बजट सत्र भी सिर पर है। 16 जून से शुरू होना है। सब हार की खीझ मिटाने में व्यस्त हैं। बताते हैं ऐसे में यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने कमान संभाल रखी है। 

11 सीटों उप चुनाव से आ सकती है संजीवनी

मायावती व अखिलेश यादव - फोटो : amar ujala
आप कह सकते हैं कि उ.प्र. के विपक्षी राजनीतिक दलों के पास यह एक अवसर है। वह चाहे तो अपनी खीझ को कुछ हद तक खुशी में बदल सकते हैं। लोकसभा चुनाव के बाद उ.प्र. की कुछ 11 सीटों पर विधानसभा चुनाव होना है। बसपा के एक नेता का सुझाव है कि यदि विपक्ष एकजुट होकर इनमें आठ सीट पर भी भाजपा के उम्मीदवार को हरा दे तो एक ढंग का संदेश चला जाएगा।

लेकिन चुनाव में हार से बिलबिलाई बसपा के नेता अपनी बात रखने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि ऐसा सपा-बसपा-कांग्रेस-रालोद में एक तालमेल से ही संभव है। इधर वह अपना तर्क दे रहे थे कि दूसरी तरफ मायावती ने उपचुनाव में सभी सीटों पर चुनाव में अकेले जाने का ऐलान कर दिया है। हालांकि इसके बाद भी सूत्र का कहना है कि चुनाव तो अभी होने नहीं जा रहे हैं। इसमें समय है। तब तक क्या जाने सदबुद्धि आ जाए। 

सरदारत बचाने में जुठे मराठा सरदार

शरद पवार, सुप्रीया सूले - फोटो : social media
कहते हैं धमनियों में रक्त का प्रवाह जब मंथर होता जाता है तो व्यक्ति के पास विवेक का ही सहारा रह जाता है। इस समय मराठा सरदार कहे जाने वाले शरद पवार की यही स्थिति है। लोकसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना के अभूतपूर्व प्रदर्शन से सरकार भी चिंतित हैं। उनकी चिंता का एक बड़ा कारण अपनी पार्टी एनसीपी में दिखाई दे रही चिनगारी है। एक तो शक्ति क्षीण और ऊपर से चिनगारी सच में लक्षण कुछ अच्छे नहीं है।

मराठा सरदार बेटी सुप्रिया सूले को धीरे-धीरे वारिस के तौर आगे करते चले जा रहे हैं। लेकिन यह परिवार के ही लोगों को हजम नहीं हो रहा है। उनके रणनीतिकार सहयोगी प्रफुल्ल पटेल का दांव भी ढंग से काम नहीं कर पा रहा है। बताते हैं ऐसे में शरद पवार जल्द ही कोई बड़ा कदम उठा सकते हैं। वह चाहते हैं कि कुछ ऐसी पहल की जाए, जिसमें विरासत और सम्मान दोनों बचा रहे। 

क्या करेंगे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार?

नीतीश कुमार
भाजपा के एक धड़े को इसकी परवाह नहीं है। अमित शाह का करीबी धड़ा भी आकलन कर रहा है कि बिहार में अगले साल प्रस्तावित विधानसभा चुनाव में आसानी से भाजपा की सरकार बन सकती है। बताते हैं लोकसभा चुनाव-2019 के नतीजे ने भाजपा को उत्साह से भर दिया है। भाजपा ने उ.प्र. में भी बाजी मार ली है और उत्तर के आठ राज्यों में परचम फहराया है। जद(यू) के पारखी नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस आहट को बखूबी भांप रहे हैं। उन्हें सीट बंटवारे से लेकर सबकुछ सपने में दिखाई दे रहा है। इसलिए वह एक नई राजनीति का जाल बुनने में लग गए हैं।

केंद्र की सरकार को बाहर से समर्थन देने का नीतीश कुमार का निर्णय इसी नजरिए से देखा जा रहा है। नीतीश कुमार पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी काफी भरोसा करते हैं। नीतीश को पता है कि राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव के पास विकल्प सीमित है। इसलिए भाजपा को आंख दिखा सकते हैं। जबकि भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री इस तरह की राजनीति पर बहुत भरोसा नहीं करते। उनकी नजर में एक न एक दिन बिहार में भाजपा की सरकार भी है। देखिए आगे होता है क्या।

क्या उद्धव ठाकरे के हाथ लगेगी दूसरी लॉटरी

अमित शाह-उद्धव ठाकरे - फोटो : PTI
क्या उद्धव ठाकरे के हाथ दूसरी लॉटरी लगेगी? क्या भाजपा महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में आधी सीट पर लड़ेगी और आधी शिवसेना के पाले में जाएगी। यानी 288 सदस्यीय विधानसभा की 135 सीट पर भाजपा और 135 सीट पर शिवसेना लड़ेगी? हो चाहे जो लेकिन महाराष्ट्र के मंत्री चंद्रकांत पाटिल ने इस संभावना को हवा दे दी है।

हालांकि भाजपा नेताओं का कहना है कि  महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने में अभी समय है। इससे पहले मानसून आएगा और मुंबई में जोरदार बारिश होगी। भाजपा के महाराष्ट्र से जुड़े एक अन्य नेता कहना है कि हो चाहे जो चुनाव बाद मुख्यमंत्री भाजपा का ही होगा। देवेंद्र फडणवीस फिर सीएम बनेंगे। हां शिवसेना को उपमुख्यमंत्री का पद दिया जा सकता है। 

हुड्डा जी निबट गए

भूपेंद्र सिंह हुड्डा - फोटो : self
हरियाणा के पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा, उनके पुत्र दीपेंद्र हुड्डा चुनाव हार गए। वह भी जाट बाहुल सीटों से। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के गैर जाट समीकरण ने काम किया और दोनों हुड्डा निबट गए। यह खबर भाजपा से ज्यादा कुछ कांग्रेस के नेताओं को खुशी दे रही है। कांग्रेस के मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला को भी खराब नहीं लग रही है। अशोक तंवर को भी लग रहा है कि एक प्रतिस्पर्धी निबट गया।

इसी साल हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने हैं। कांग्रेस पार्टी के चार चेहरे सीएम की रेस में खुद को लेकर चल रहे हैं। कु. शैलजा भी एक अवसर की तरह देख रही हैं। ऐसे में पिता पुत्र हुड्डा चुनाव हार जाएं तो पार्टी के अंदरुनी विरोधियों को इसमें बुरा क्या लगना।
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ये तो कैप्टन हैं जी

अमरिंदर सिंह
ये पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह हैं।  वास्तव में कैप्टन। पूरी धोबिया पछाड़ राजनीति करते हैं। कैप्टन चित और पट दोनों अपनी जेब में रखते हैं। विरोधियों की बिना परवाह किए प्यार से उन्हें निबटा देते हैं। चाहो तो प्रताप सिंह बाजवा और राजिंदरकौर भट्ठल से पूछ लो। प्रताप सिंह बाजवा तो आजकल पंजाब की बजाय ज्यादातर समय दिल्ली में कांस्टीट्यूशन क्लब में बने जिम को दे रहे हैं। सेहत का अच्छा ख्याल कर रहे हैं। नवजोत सिद्धू भी कैप्टन की कप्तानी से हार मान चुके हैं।

बताते हैं कि कैप्टन रौ में होते हैं तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से अपने तरीके से बात करते हैं। कैप्टन ही ऐसे नेता हैं जिन्होंने लोकसभा चुनाव में पंजाब से कांग्रेस को खुश होने वाला परिणाम दिया है। लिहाजा कैप्टन के नाम पर दिल्ली का कांग्रेस हाई कमान भी कान में तेल डाल लेता है। कोई चाहे तो इसे आशा कुमारी से पूछ सकता है। 
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