चुल्लूभर पानी में कैसे डूब गई कांग्रेस किश्ती?
इसका दर्द कोई कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से पूछ ले। सच पूछिए को राहुल बहुत तंग चल रहे हैं। उनकी युवा ब्रिगेड के देशभर के नेता बहुत आहत हैं। सुष्मिता देव, मिलिंद देवड़ा, सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया समेत सबके भीतर आग धधक रही है। आग राहुल और प्रियंका के भीतर भी धधक रही है। वहीं यूपीए चेयरपर्सन भी हालात देखकर हैरान और हतप्रभ हैं। सबकी जड़ में बस युवा और वरिष्ठ नेताओं की बढ़ी खाई है। राहुल ब्रिगेड का मानना है कि गुजरात चुनाव में अच्छी सीटें आई तो सफलता अशोक गहलोत समेत कई ले उड़े। म.प्र. में चुनाव जीते तो दिग्विजय, कमलनाथ समेत अन्य की जोड़ी ले उड़ी। राजस्थान में चुनाव जीते तो वहां भी श्रेय लेने वालों की कमी नहीं रही। यही नहीं राजस्थान, म.प्र., छत्तीसगढ़ में कुर्सी पाने के लिए भी होड़ मच गई।
लोकसभा चुनाव में केवल 52 सीटें आई तो निबट गए राहुल गांधी और चुक गई प्रियंका। असल का दर्द इसी का है। इतना ही नहीं चुनाव प्रचार के दौरान वह कई मोड़ पर कांग्रेस अध्यक्ष अकेले नजर आए। राहुल कुछ इसी तरह का दर्द अपने वफादार युवा कांग्रेस नेताओं से भी साझा कर रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष का आज भी मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के लिए 2019 का चुनाव आसान नहीं था। कांग्रेस पार्टी 100 लोकसभा सीट तक आसानी से जा सकती थी। लेकिन कांग्रेस पार्टी ही एकजुटता से चुनाव नहीं लड़ी। कई नेता तो बस दिखाने, नंबर गिनाने के लिए साथ दे रहे थे। कई तो घर से भी संभलकर ही निकले। पार्टी के एक रणनीतिकार का कहना है कि जब प्रधानमंत्री की छवि पर सीधा हमला होलकर कांग्रेस ने भाजपा से मोर्चा ले लिया तो राहुल गांधी अभिमन्यु की तरह अकेले लडऩे लगे थे। लिहाजा अब कांग्रेस अध्यक्ष मुखर हैं। हैरानी इसके बाद भी हुई। उनके संकेत देने के बाद भी कोई वरिष्ठ कांग्रेस अपनी कुर्सी नहीं छोड़ रहा।
खल रही है अरुण जेटली की कमी
संसद के दोनों सदनों और सरकार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संकट मोचक रहे हैं। अब स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं। प्रधानमंत्री उन्हें अपना सच्चा मित्र मानते हैं। इसलिए समय-समय पर हाल-चाल लेना टेलीफोन करना नहीं भूलते। सलाह के स्तर पर भी सरकार चलाने में जेटली की सलाह काफी अहम होती थी, अब प्रधानमंत्री को उनके मंत्रिमंडल में साथ न होने की कमी खल रही है। प्रधानमंत्री ने संसद में अपने संबोधन में भी जेटली का जिक्र करके उनका महत्व बताया था। एक केन्द्रीय मंत्री की माने तो मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री के पास ऐसा कोई मित्र या फिर बराबर का महसूस होने वाला सहयोगी नहीं है, जिसपर वह आंख मूंद कर भरोसा कर लें। वह जेटली ही थे जब प्रधानमंत्री गुजरात के मुख्यमंत्री थे और जेटली दिल्ली में हर पल उनके साथ थे।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को कुछ समय दिल्ली में गुजारना पड़ा था। तब अरुण जेटली बड़ा सहारा थे। यही वजह रही कि प्रधानमंत्री के 2014 के मंत्रिमंडल में जेटली की छाप साफ दिखाई पड़ी। पीयुष गोयल, निर्मला सीतारमण समेत कई चेहरे इसका हिस्सा बने। हरदीप पुरी समेत कई अन्य भी शामिल हुए। दूसरे कार्यकाल में भी जेटली के करीबियों की जगह बनी रही। यहां तक कि पीयुष गोयल रह गए और निर्मला सीतारमण वित्तमंत्री बन गई। अनुराग ठाकुर वित्तराज्यमंत्री बने तो उ.प्र. सरकार में श्रीकांत शर्मा की जगह बनी।
2022 की बसपा बना रही हैं मायावती
बसपा प्रमुख मायावती काफी संवेदनशील हो गई हैं। उन्हें भी लग रहा है कि बसपा में आमूल-चूल परिवर्तन लाना जरूरी है। पुराने थके नेताओं के साथ अब बसपा प्रमुख ने युवा नेताओं को जोड़ने का मन बनाया है। गांव-गांव तक बसपा के कॉडर को जगाने, सर्वजन हिताय के फार्मूले पर चलकर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर और संस्थापक कांशीराम के बहुजन समाज को साधने की क्रांति शुरू कर दी है। इसके लिए बसपा ने छिटक गई और छिटकने की संभावना वाली जातियों पर खासा फोकस कने की रणनीति बनानी शुरू की है। बसपा प्रमुख लगातार बैठक कर रही हैं। बसपा के नेताओं की जिम्मेदारी तय करके उनसे गांव, ब्लाक, तहसील और जिला स्तर पर मूवमेंट में तेजी लाने के लिए कहा जा रहा है।