ट्रंप खुद के लिए नोबेल शांति पुरस्कार चाहते थे। क्या सिर्फ युद्ध रुकवाने भर के दावों से कोई दावा पेश कर सकता है?
मैं तो उनका धन्यवाद करता हूं। पहले लोग मुझे एयरपोर्ट पर पहचान जाते थे। ट्रंप ने नोबेल शांति पुरस्कार को इतना प्रचारित कर दिया कि मेरे जैसे लोगों की पूछ होने लगी। लोग सोचते हैं कि दुनिया का सबसे ताकतवर नेता जिस पुरस्कार को पाने के लिए परेशान है, वह हमारे देश के पास पहले से है। लोग सोचते थे कि अमेरिका की सरकारें या वहां के लोग इस पुरस्कार की चयन प्रक्रिया को प्रभावित करते होंगे या इसके लिए लॉबिंग होती होगी। हालांकि, जब ट्रंप को ही यह सम्मान नहीं मिल पाया, तो अब वही लोग मान रहे हैं कि उनका अनुमान गलत था।
पुरस्कार मिलने के बाद आपने पहला काम क्या किया?
उस समय प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति थे। वह बहुत भावुक हो गए। उन्होंने एक बात कही, जो दिल को छू गई। उन्होंने कहा, भारत शांति के लिए जाना जाता है, मानवता के लिए जाना जाता है, लेकिन भारत की धरती पर एक भी शांति का नोबेल नहीं था। रवींद्रनाथ टैगोर के पास एक नोबेल था, लेकिन वह भी शांति का नहीं था। बाद में, मैंने परिवार से चर्चा की, तो तय हुआ कि राष्ट्र को समर्पित कर देते हैं। मैंने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखी। उन्होंने मुझे बुलाया। कहा, हम ले नहीं सकते, क्योंकि इतिहास में किसी ने इस पुरस्कार को राष्ट्र को समर्पित नहीं किया। मैंने कहा-मैं फैसला कर चुका हूं। लेकिन, इसका कोई प्रोटोकॉल नहीं था। उन्होंने नया प्रोटोकॉल बनवाया और पुरस्कार राष्ट्रपति भवन के म्यूजियम में रखवाया।