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Interview: नोबेल विजेता कैलाश सत्यार्थी बोले- बच्चों में बढ़ रही नकारात्मक सोच, परिवार और स्कूल की भूमिका अहम

Thu, 29 Jan 2026 04:32 AM IST
शिवम गर्ग अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली

सार

नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि गैजेट्स का बढ़ता इस्तेमाल बच्चों में नकारात्मक सोच और मानसिक समस्याएं पैदा कर रहा है, जिससे परिवार और शिक्षा व्यवस्था को सतर्क होने की जरूरत है। पढ़िए उनसे हुई चर्चा के प्रमुख अंश...

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नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बीते कई महीनों से नोबेल शांति पुरस्कार की चर्चा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद के लिए लगातार इस पुरस्कार की मांग कर रहे थे। उन्हें जब यह सम्मान नहीं मिला, तो कहने लगे कि मुझे नोबेल नहीं दिया गया, तो शांति मेरी जिम्मेदारी नहीं है। इसी चर्चा के बीच नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी अमर उजाला के न्यूजरूम में आए। पढ़िए उनसे हुई चर्चा के प्रमुख अंश...

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आजकल तकनीक और गैजेट तक बच्चों की बहुत आसान पहुंच हो गई है। उसे कैसे देखते हैं?
मैं इंजीनियर हूं। तकनीक में मेरी काफी दिलचस्पी बनी रहती है। सोशल मीडिया के पीछे भी बहुत सारी राजनीति है। बहुत सारा व्यापार है। ज्ञान के विस्तार में तो बच्चों का जरूर लाभ होता है, पर इसके अलावा जो सामग्री डाली जाती है, वह समाज को नुकसान पहुंचाती है। खासकर बच्चों को, जो कोमल मस्तिष्क हैं, नुकसान पहुंचाने वाली बहुत सामग्री है। सबसे ज्यादा चिंताजनक बाल यौन उत्पीड़न है। प्रतियोगिता तो ठीक है, लेकिन ये बहुत ही टेढ़ी खीर है। गैजेट का इस्तेमाल बढ़ने का एक और कारण है कि माता-पिता या परिवार के लोग बच्चों के साथ दोस्ती का रिश्ता नहीं रखते। बच्चे की बात सुनने का सामर्थ्य आपमें नहीं है, तो बच्चे उन्हीं गैजेट्स में घुसे रहते हैं और उनमें नकारात्मकता आती चली जाती है।

पढ़ाई के बोझ की वजह से बच्चों में दूसरों से बेहतर या कमजोर होने की भावनाएं पैदा की जा रही हैं। इस पर क्या सोचते हैं?
हमारे यहां शिक्षा भी कई स्तरों की है, तो कहीं न कहीं भेदभाव, अलगाव, दूरियां बढ़ती जाती हैं। इससे हीनभावना बढ़ती है। बच्चों में खुद को ज्यादा बेहतर समझने की भावना बढ़ती है। यह भावना स्कूल के समय से चलती है। फिर कॉलेज आते-आते काफी प्रबल हो जाती है। बच्चे अगर संपन्न वर्ग से हों, तो वह वैसी ही मानसिकता घर से सीखकर बाहर निकलते हैं। स्कूल में भी वातावरण ऐसा हो, जहां बच्चे एक-दूसरे की मदद करना सीखें, सम्मान करना सीखें।

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ट्रंप खुद के लिए नोबेल शांति पुरस्कार चाहते थे। क्या सिर्फ युद्ध रुकवाने भर के दावों से कोई दावा पेश कर सकता है?
मैं तो उनका धन्यवाद करता हूं। पहले लोग मुझे एयरपोर्ट पर पहचान जाते थे। ट्रंप ने नोबेल शांति पुरस्कार को इतना प्रचारित कर दिया कि मेरे जैसे लोगों की पूछ होने लगी। लोग सोचते हैं कि दुनिया का सबसे ताकतवर नेता जिस पुरस्कार को पाने के लिए परेशान है, वह हमारे देश के पास पहले से है। लोग सोचते थे कि अमेरिका की सरकारें या वहां के लोग इस पुरस्कार की चयन प्रक्रिया को प्रभावित करते होंगे या इसके लिए लॉबिंग होती होगी। हालांकि, जब ट्रंप को ही यह सम्मान नहीं मिल पाया, तो अब वही लोग मान रहे हैं कि उनका अनुमान गलत था।

पुरस्कार मिलने के बाद आपने पहला काम क्या किया?
उस समय प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति थे। वह बहुत भावुक हो गए। उन्होंने एक बात कही, जो दिल को छू गई। उन्होंने कहा, भारत शांति के लिए जाना जाता है, मानवता के लिए जाना जाता है, लेकिन भारत की धरती पर एक भी शांति का नोबेल नहीं था। रवींद्रनाथ टैगोर के पास एक नोबेल था, लेकिन वह भी शांति का नहीं था। बाद में, मैंने परिवार से चर्चा की, तो तय हुआ कि राष्ट्र को समर्पित कर देते हैं। मैंने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखी। उन्होंने मुझे बुलाया। कहा, हम ले नहीं सकते, क्योंकि इतिहास में किसी ने इस पुरस्कार को राष्ट्र को समर्पित नहीं किया। मैंने कहा-मैं फैसला कर चुका हूं। लेकिन, इसका कोई प्रोटोकॉल नहीं था। उन्होंने नया प्रोटोकॉल बनवाया और पुरस्कार राष्ट्रपति भवन के म्यूजियम में रखवाया।

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