चार दिन पहले उच्चतम न्यायालय की इन-हाउस कमिटी ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर अदालत की एक पूर्व महिला कर्मचारी द्वारा लगाए गए यौन शोषण के मामले में क्लीनचिट दे दी थी। अब अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल का कहना है कि उन्होंने मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को पत्र लिखा है और उनपर लगे आरोपों की जांच तीन सेवानिवृत्त जजों के पैनल से करवाने की बात कही है।
अदालत की इन-हाउस कमिटी को महिला के सीजेआई पर लगाए गए आरोपों में कोई दम नहीं मिला था। पैनल ने महिला के यौन उत्पीड़न के आरोपों को तथ्य व सबूतों के अभाव में खारिज कर दिया। इस मामले की जांच तीन सिटिंग जज जस्टिस एसए बोबडे, इंदिरा बनर्जी और इंदू मल्होत्रा ने की थी।
शुक्रवार को राफेल पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के बाद पत्रकारों से बात करते हुए
केके वेणुगोपाल ने कहा कि उन्होंने जस्टिस बोबडे के नेतृत्व वाली पीठ के सामने सुझाव दिया है। उन्होंने कहा, 'मैंने 22 अप्रैल को सीजेआई को चार वरिष्ठ जजों के नाम के साथ पत्र लिखा था। 23 तारीख को जस्टिस बोबडे वाले पैनल की घोषणा हुई। मैंने 23 अप्रैल को दूसरा पत्र लिखा ताकि यह साफ किया जा सके कि उन्होंने इससे पहले जो पत्र लिखा था वह उनका निजी दृष्टिकोण था।'
इससे पहले जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने दो मई को एक पत्र लिखकर जस्टिस बोबडे के नेतृत्व वाले पैनल को इस मामले की जांच पूर्ण अदालत में कराने की मांग की थी। महिला शिकायतकर्ता को वकील न देने को उन्होंने निष्पक्ष प्रक्रिया से इनकार बताया था। जस्टिस चंद्रचूड़़ ने पत्र में लिखा था कि यह उसकी गरिमा का सवाल है, जिसे संरक्षित करने की आवश्यकता है। एक वकील का प्रावधान विशेषाधिकार नहीं है बल्कि शिकायतकर्ता का अधिकार है।
जस्टिस चंद्रचूड़ जिन्होंने जस्टिस बोबडे से भी मुलाकात की उन्होंने समिति को व्यापक बनाने के लिए एक बाहरी सदस्य को शामिल करने का तर्क दिया था। इसके लिए उन्होंने उच्चतम न्यायालय की तीन सेवानिवृत्त जजों- जस्टिस रुमा पाल, सुजाता मनोहर और रंजना देसाई के नाम का सुझाव दिया था। उन्होंने कहा था कि यह सभी गैर राजनीतिक और ईमानदार हैं।