सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रविंद्र भट ने गैर अधिसूचित जनजातियों (डीएनटी) पर आपराधिक न्याय प्रणाली के असंगत प्रभाव से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर बुधवार को प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि राज्यों को इन लोगों की मुश्किलों को कम करने के लिए सक्रिय रूप से उपाय करने की जरूरत है जिन लोगों के पास लंबे अरसे से कानूनी प्रक्रियाओं से खुद को बचाने के लिए कोई संसाधन नहीं हैं ताकि इन लोगों की रिहाई के लिए वहन करने योग्य लागत सुनिश्चित की जा सके।
जस्टिस भट ने यह बात बुधवार को कठोर आपराधिक जनजाति अधिनियम, 1871 (सीटीए) के रद्द होने की 70वीं वर्षगांठ के अवसर पर एक व्याख्यान के दौरान कही। उन्होंने कहा कि समाज में यह आम धारणा है कि पियक्कड़पन कुछ जनजातियों से जुड़ा हुआ है और समाज यह समझने में विफल रहा है कि यह उसी के कार्यों का परिणाम है जिसकी वह आलोचना करता है। उन्होंने कहा कि देसी शराब निर्माण क्षेत्र में दूसरों के लिए काम करने या उपभोग करने या उत्पादन करने वालों की अनुपातहीन संख्या में गिरफ्तारी की जाती है।
उन्होंने कहा कि आबकारी कानून के तहत कार्रवाई के चलते उन पर कठोर दंड वास्तविकता है। इन लोगों के पास कानूनी प्रक्रियाओं से खुद को बचाने के लिए कोई संसाधन नहीं है, ऐसे में राज्यों को इनकी परेशानी कम करने के लिए तत्परता से उपाय करने की जरूरत है ताकि उनकी रिहाई के लिए वहन करने योग्य लागत सुनिश्चित की जा सके। उन्होंने कहा कि ये समुदाय पहली बार पकड़े जाने के बाद से चक्रीय दंड के चलते बर्बाद हो जाते हैं।