तमिलनाडु के गिरफ्तार मंत्री वी सेंथिल बालाजी की पत्नी द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के लिए बुधवार को मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सीवी कार्तिकेयन को चुना गया। इससे पहले एक खंड पीठ ने खंडित फैसला सुनाया था। मामले को गुरुवार दोपहर 2.30 बजे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
मूल रूप से न्यायमूर्ति जे निशा बानू और न्यायमूर्ति डी भरत चक्रवर्ती की खंडपीठ ने चार जुलाई को द्रमुक मंत्री सेंथिल बालाजी की पत्नी एस मेगाला द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (एचसीपी) पर खंडित फैसला सुनाया था। याचिका में मेगाला ने आरोप लगाया कि उनके पति मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय की अवैध हिरासत में हैं। उसने अदालत से प्रार्थना की कि बालाजी को अदालत के सामने पेश किया जाए और अदालत उन्हें रिहा करे।
गौरतलब है कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने ‘रुपये के बदले नौकरी देने’ से जुड़े प्रकरण में बालाजी को मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम के तहत पिछले महीने गिरफ्तार किया था। खंडित फैसला सुनाने वाली मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे निशा बानू और न्यायमूर्ति डी भरत चक्रवर्ती की खंडपीठ ने रजिस्ट्री को विषय को एक तीसरे न्यायाधीश के पास भेजने के लिए इसे मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया।इसके बाद मुख्य न्यायाधीश एस वी गंगापुरवाला ने बुधवार को न्यायमूर्ति सीवी कार्तिकेयन को एचसीपी की सुनवाई के लिए तीसरे न्यायाधीश के रूप में नामित किया।
शीर्ष न्यायालय के न्यायाधीश, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से कहा कि बालाजी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर नयी पीठ द्वारा शीघ्रता से निर्णय लिया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति निशा बानू ने बालाजी (47) की पत्नी द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार कर ली, जबकि न्यायमूर्ति चक्रवर्ती ने इसे खारिज कर दिया। याचिका स्वीकार किए जाने योग्य होने का उल्लेख करते हुए न्यायमूर्ति बानू ने पुलिस को बालाजी को छूट देने का निर्देश दिया क्योंकि वह बगैर विभाग वाले मंत्री हैं। इससे असहमति जताते हुए न्यायमूर्ति चक्रवती ने अपने आदेश में चार सवाल रखे और उनके जवाब दिए।
शीर्ष न्यायालय में, सुनवाई की शुरुआत में प्रवर्तन निदेशालय की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत की पीठ से कहा कि चूंकि उच्च न्यायालय ने खंडित फैसला सुनाया है, इसलिए मामले को अंतिम फैसले के लिए शीर्ष न्यायालय में स्थानांतरित किया जाना चाहिए। मेहता ने कहा, मेरी मुश्किल यह है कि हर दिन सबूतों से छेड़छाड़ होगी। यह विशुद्ध रूप से कानून का सवाल है और कोई भी तथ्य विवादित नहीं है। एकमात्र सवाल यह है कि क्या न्यायिक हिरासत पर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की जा सकती है।
उन्होंने कहा कि यह प्रभावशाली व्यक्ति का मामला है और अगर नुकसान होता है तो इसकी भरपाई नहीं हो पाएगी। शीर्ष न्यायालय में बालाजी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि एक खंडपीठ के खंडित फैसले के बाद मामला तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष रखा गया है और उन्होंने मेहता के अनुरोध का विरोध किया।
इससे पहले बालाजी को राहत देते हुए शीर्ष न्यायालय ने 21 जून को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के आग्रह के बावजूद उन्हें इलाज के लिए एक निजी अस्पताल में स्थानांतरित करने की अनुमति देने के मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।