कपिल सिब्बल, मुकुल रोहतगी, अभिषेक मनु सिंघवी, दुष्यंत दवे, शेखर नाफडे समेत अन्य वरिष्ठ वकीलों ने जस्टिस मिश्रा से बार के सदस्यों के साथ विनम्र और सहनशील रहने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि बार और पीठ दोनों का ही यह कर्तव्य है कि वे अदालत की गरिमा बनाए रखें और दोनों को परस्पर एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए।
इन सभी ने कहा कि अदालत में शिष्टता बनी रहनी चाहिए। लिहाजा जस्टिस मिश्रा को और विनम्र होना चाहिए। वहीं रोहतगी ने कहा कि कई युवा वकील इस कोर्ट में आने से डरते हैं, चाहे कारण सही हो या गलत। सभी ने कहा कि वह किसी एक वाकये की बात नहीं कर रहे हैं बल्कि पूर्व में भी ऐसी घटनाएं हुई हैं।
जस्टिस मिश्रा के साथ पीठ में बैठे जस्टिस एमआर शाह ने कहा कि हर चीज पारस्परिक होनी चाहिए। कभी-कभार ये चीजें आवेश में हो जाती हैं। इसके बाद जस्टिस मिश्रा ने कहा कि किसी अन्य जज की तुलना में उनका बार से अधिक नाता रहा है। मैं बार का मां के समान आदर करता हूं। मैं अपने दिल से यह कह रहा हूं और कृपया इस तरह की कोई धारणा अपने दिमाग में मत रखिए। उन्होंने कहा कि मुझे किसी के प्रति भी कोई शिकायत नहीं है। मैं ऐसे किसी आयोजन में नहीं जाता जिसे बार द्वारा आयोजित नहीं किया गया हो। मैं जहां भी गया वहां बार का सम्मान किया।
जस्टिस मिश्रा ने कहा कि अहंकार इस महान संस्था को नष्ट कर रहा है और बार का यह कर्तव्य है कि वह इसकी रक्षा करे। उन्होंने कहा कि आजकल न्यायालय को उचित ढंग से संबोधित नहीं किया जाता। यहां तक उस पर हमला बोला जाता है। यह सही नहीं है और इससे बचने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि मामले में बहस के दौरान वकील को किसी के भी बारे में व्यक्तिगत टिप्पणियां करने से बचना चाहिए।
'मैं बार से जुड़ा रहा हूं और यह कहना चाहता हूं कि बार पीठ की जननी है। मैंने न्यायाधीश के तौर पर अपने पूरे करियर में किसी भी वकील के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही करने की पेशकश नहीं की। अहंकार किसी के लिए भी अच्छा नहीं है लेकिन कुछ वकील कई मौकों पर इसका प्रदर्शन करते हैं। मेरी बात से किसी को ठेस पहुंची हो तो मैं हाथ जोड़कर माफी मांगता हूं।' - जस्टिस अरुण मिश्रा