चुनावी बिगुल बजते ही जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में चुनावी सरगोशी तेज हो गई है। जेएनयू में आठ सितंबर को चुनाव होना है और इसका सबसे चर्चित प्रेसिडेंशियल डिबेट 6 सितंबर को होगा, जो हर बार की तरह इसबार भी यह तय करेगा कि इस बार का यह चुनाव किस करवट बैठने वाला है।
9 फरवरी 2016 को जेएनयू में लगे देश विरोधी नारे के बाद इस बार का चुनाव कई मामलों में खास होने वाला है। अलग-अलग पार्टी के प्रवक्ताओं से बात करने के बाद एक कॉमन बात सामने आई कि सभी पार्टी कुल मिलाकर स्टूडेंट से जुड़े मुद्दों के बीच जेएनयू से हटाए गए 900 स्टूडेंट्स पर अपनी बात रख रहे हैं। वहीं दूसरा बड़ा मुद्दा नजीब की गुमशुदगी भी है। लेकिन इस चुनाव को एक और बात अलग कर रही है वो है महिला शक्ति।
चुनावी मैदान में उतरीं सभी पार्टियों ने अपनी प्रेसिडेंट कैंडिडेट महिला को रखा है। जिसमें एबीवीपी की निधि त्रिपाठी, एआईएसएफ की अपराजिता राजा, कंबाइंड लेफ्ट से गीता कुमारी, बापसा की शबाना अली और एनएसयूआई की वृष्णिका सिंह मैदान में हैं। गौरव और मोहम्मद फारुख भी मैदान में हैं लेकिन उनपर कोई बात भी नहीं कर रहा है।
2014 में आइसा के प्रेसिडेंट रहे आशूतोष बताते हैं कि महिला देश का मुद्दा है। जेएनयू चुनाव हमेशा से देश की दशा और दिशा तय करता रहा है। देश की संसद ने भले ही महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण न दिया हो लेकिन जेएनयू की अपनी दिशा है और हम बताना चाहते हैं कि महिलाएं कदम कदम पर पुरुषों के साथ हैं लेकिन फिर भी समाज ने उन्हें हासिए पर रखा है।