80 के दशक में जब राष्ट्रीय स्तर पर झारखंड राज्य गठन के बारे में पहली बार विचार सामने आया तब ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन की तर्ज पर आजसू को झारखंड मुक्ति मोर्चा के यूथ विंग के तौर पर 22 जून 1986 को स्थापित किया गया। झारखंड राज्य की मांग ने आजसू को एक राज्यस्तरीय पार्टी के रूप में पहचान दी।
आजसू ने झामुमो से तोड़ा नाता
अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर इनकी प्रतिबद्धता इतनी ज्यादा थी कि इन्होंने 1989 के लोकसभा चुनावों के बहिष्कार करने का फैसला किया। इसके लिए बिहार में हड़ताल और बंद का आह्वान किया गया। शिबू सोरेन के नेतृत्व वाली झारखंड मुक्ति मोर्चा ने आजसू का इस बहिष्कार का समर्थन नहीं किया। यहीं से आजसू ने अपनी राजनीति को झामुमो से अलग कर लिया।
आजसू की मांग और व्यापक जनसमर्थन के आगे झुकते हुए 1995 में बिहार सरकार ने झारखंड एरिया ऑटोनोमस काउंसिल का गठन कर दिया। 90 सदस्यों वाली इस काउंसिल में झामुमो के 41 जबकि जनता दल 31 सदस्य थे। आजसू ने इसका भी बायकॉट किया। उसने पूर्ण राज्य के लिए अपने आंदोलन को और तेज कर दिया।
जींस टीशर्ट पहनने वाले सुदेश महतो पहली बार बने विधायक
1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनते ही झारखंड को अलग राज्य बनाने की कवायद शुरू कर दी गई। 2000 में झारखंड एक अलग राज्य बन गया। सुदेश महतो पहली बार सिल्ली से विधायक बने। सूत्रों के अनुसार, झारखंड में हुए पहले चुनाव में लालू लालू प्रसाद यादव ने अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए सुदेश महतो से समर्थन के बदले मंत्री पद देने का वादा किया था पर उन्होंने इनकार कर दिया।
महतो ने बाबूलाल मरांडी की सरकार को समर्थन दिया और बदले में उन्हें मंत्री पद मिला। इसके बाद वह आजसू के अध्यक्ष भी बने।