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जनता दल (सेक्युलर) का प्रदर्शन तय करेगा कर्नाटक चुनाव की दिशा

Thu, 10 May 2018 11:00 PM IST
विनोद अग्निहोत्री, अमर उजाला, बेंगालुरू 
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- फोटो : SELF
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कर्नाटक विधानसभा चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दोनों ने अपनी अपनी जीत के दावे किए हैं। लेकिन दोनों दलों की नजरें पूर्व प्रधानमंत्री एच.ड़ी.देवेगौड़ा की पार्टी जनता दल(एस) के प्रदर्शन और पुराने मैसूर की 61 सीटों के नतीजों पर टिकी हैं, क्योंकि पुराना मैसूर इलाके को ही देवेगौड़ा का गढ़ माना जाता है और जद(एस) की चुनावी सफलता या विफलता इस इलाके में उसके प्रदर्शन पर निर्भर है और जद(एस) पर कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों का दारोमदार टिका है।

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अगर जद(एस) की सीटें पिछली बार जैसी या उससे ज्यादा आईं तो कांग्रेस की राह में रोड़े आएंगे और अगर जद(एस) की सीटें पिछली बार से घट कर आधी या उससे कुछ ज्यादा ही रहीं तो भाजपा का रास्ता अटक सकता है। 

कर्नाटक में विधानसभा सीटों के क्षेत्रवार विभाजन के मुताबिक पुराने मैसूरु इलाके में 61 सीटें, बेंगालुरू में 28, मध्य कर्नाटक में 26 तटीय कर्नाटक में 19 मुंबई कर्नाटक में 50 और हैदराबाद कर्नाटक में 40 सीटें हैं। इनमें पुराने मैसूरु की 61 सीटों में से करीब 55 सीटों पर कांग्रेस और जद(एस) के बीच सीधा मुकाबला है। जबकि छह सीटें एसी हैं जहां कांग्रेस,
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भाजपा और जद(एस) के बीच त्रिकोणात्मकसंघर्ष है। 

2008 में जब राज्य में भाजपा के पक्ष में जबरदस्त सहानुभूति लहर थी और वीएस येदुयेरप्पा की लोकप्रियता और छवि अपने चरम पर थी, तब भी भाजपा पुराने मैसूर इलाके में सिर्फ सात सीटें ही जीत पाई थी।

जबकि 2013 में उसके खाते में मात्र दो सीटें गईं। इस बार भी पुराने मैसूर इलाके में रामनगर जिले की एक सीट चन्नपट्टन में जद(एस) के साथ और मैसूर की चार सीटों पर भाजपा कांग्रेस के साथ मुकाबले में है।

अगर वरुणा सीट पर येदुयेरप्पा के बेटे वीएस वीरेंद्र को भाजपा टिकट देती तो उसे आसपास की चार पांच सीटों पर फायदा हो सकता था। लेकिन वीरेंद्र का टिकट कटने का नुकसान पार्टी को इस इलाके में उठाना पड़ रहा है। 

वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र मिश्रा के मुताबिक इस बार का चुनाव वाकई बेहद दिलचस्प है। राज्य में प्रकट रूप से किसी के भी पक्ष में कोई लहर नहीं है और नही कोई एसा मुद्दा है जिसका असर जाति, धर्म और क्षेत्र से ऊपर उठकर पूरे राज्य पर असर हो। जातीय समीकरण, स्थानीय कारण और चुनाव प्रचार व प्रबंधन जिसके पक्ष में होगा, वही दल सरकार बनाएगा। लेकिन जद(एस) के प्रदर्शन पर कांग्रेस और भाजपा के चुनाव नतीजों का काफी दारोमदार है।

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