जापान जल्द ही फुकुशिमा परमाणु संयंत्र के रेडियोएक्टिव दूषित जल को प्रशांत महासागर में बहाएगा। जापान की इस योजना पर दूसरे देशों से मिश्रित प्रतिक्रिया मिली है। जहां अमेरिका ने जापान का समर्थन किया है तो चीन ने इस पर कड़ा विरोध जताया है। वहीं, इस फैसले से भारतीय समुद्री तटों पर रेडियोएक्टिव कचरे के प्रदूषण का खतरा हो सकता है।
जापान ने 2011 की सुनामी में नष्ट हो चुके फुकुशिमा परमाणु संयंत्र के रेडियोएक्टिव दूषित जल को समुद्र में बहाने का निर्णय लिया है। यह दूषित जल प्रशांत महासागर में बहाया जाएगा। इसके लिए उसे संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी संस्था से मंजूरी भी मिल गई है।
विज्ञापन
जापान सरकार के फैसले से इस क्षेत्र के देशों में गहरी चिंता पैदा हो गई है। इस योजना का मछुआरों, स्थानीय निवासियों और चीन सहित कुछ देशों ने कड़ा विरोध किया है। आइए जानते हैं जापान दूषित जल समुद्र में क्यों बहा रहा? इससे क्या खतरे हो सकते हैं? इस फैसले पर देशों ने क्या कहा है? क्या इसका भारत पर भी कोई असर होगा?
फुकुशिमा का परमाणु संयंत्र
- फोटो : social media
जापान दूषित जल समुद्र में क्यों बहा रहा?
जापान जल्द ही फुकुशिमा परमाणु संयंत्र के रेडियोएक्टिव दूषित जल को प्रशांत महासागर में बहाएगा। इसी क्रम में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के प्रमुख राफेल ग्रॉसी फुकुशिमा का दौरा करने मंगलवार को जापान पहुंचे। इस दौरान वह प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा को एजेंसी की सुरक्षा समीक्षा भी प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही जहरीले जल को बहाने की जापान को संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी मिल गई।
जापान सरकार के इस निर्णय की वजह 2011 का विनाशकारी भूकंप और सुनामी है। इन आपदाओं ने फुकुशिमा परमाणु संयंत्र की बिजली आपूर्ति और शीतलन प्रणालियों को क्षतिग्रस्त कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि रिएक्टर कोर अत्यधिक गर्म हो गए और भारी रेडियोधर्मी सामग्री से संयंत्र के भीतर पानी दूषित हो गया।
तब से, रिएक्टरों में ईंधन के मलबे को ठंडा करने के लिए नया पानी डाला गया है। साथ ही जमीन और बारिश का पानी लीक हो गया है, जिससे अधिक रेडियोधर्मी अपशिष्ट जल बन गया है जिसे अब उपचारित करने की जरूरत है।
सरकारी बिजली कंपनी टोक्यो इलेक्ट्रिक पावर कंपनी (TEPCO) ने 1.32 मिलियन मीट्रिक टन अपशिष्ट जल के लिए करीब एक हजार विशाल टैंक बनाए हैं। लेकिन जगह तेजी से कम होती जा रही है। कंपनी का कहना है कि अधिक टैंक बनाना कोई रास्ता नहीं है और उसे संयंत्र को सुरक्षित रूप से बंद करने के लिए जगह खाली करने की आवश्यकता है।
फुफुशिमा के रेडियोधर्मी पानी को छोड़ने का फैसला
- फोटो : social media
इससे क्या खतरे हो सकते हैं?
TEPCO ने कहा कि रेडियोधर्मी अपशिष्ट जल में कुछ खतरनाक तत्व होते हैं लेकिन इनमें से अधिकांश को पानी से हटाया जा सकता है। असल मुद्दा रेडियोधर्मी ट्रिटियम नामक हाइड्रोजन आइसोटोप है, जिसे अलग नहीं किया जा सकता है। ऐसा करने के लिए फिलहाल कोई तकनीक भी नहीं है। जापान की सरकार और आईएईए का कहना है कि दूषित पानी को अत्यधिक पतला किया जाएगा और दशकों में धीरे-धीरे छोड़ा जाएगा।
इनका यह भी तर्क है कि ट्रिटियम प्राकृतिक रूप से पर्यावरण, बारिश के पानी, समुद्र के पानी, नल के पानी और यहां तक कि मानव शरीर में भी में होता है। इसलिए समुद्र में थोड़ी मात्रा छोड़ना सुरक्षित होना चाहिए। आईएईए की रिपोर्ट में, ग्रॉसी ने कहा कि उपचारित पानी को समुद्र में छोड़ने से लोगों और पर्यावरण पर नगण्य रेडियोलॉजिकल प्रभाव पड़ेगा।
लेकिन विशेषज्ञ इससे होने वाले जोखिम पर अलग राय दे रहे हैं। कनाडाई परमाणु सुरक्षा आयोग का कहना है कि ट्रिटियम का अगर बड़ी मात्रा में सेवन किया जाए तो कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। इस बीच, अमेरिकी परमाणु नियामक आयोग ने स्वीकार किया कि विकिरण के किसी भी संपर्क से कुछ स्वास्थ्य जोखिम पैदा हो सकता है।
मनोआ में हवाई विश्वविद्यालय में केवलो समुद्री प्रयोगशाला के निदेशक रॉबर्ट एच. रिचमंड ने इसे गलत सलाह और समयपूर्व बताया। एक चिंता यह है कि अपशिष्ट जल से समुद्री जीवन पर प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि इससे ट्रिटियम जैसे प्रदूषक समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में जमा हो जाएंगे। दुनिया के महासागरों में पहले से ही जलवायु परिवर्तन, समुद्र के अम्लीकरण, अत्यधिक मछली पकड़ने और प्रदूषण की समस्या है। खतरे सिर्फ एशिया-प्रशांत क्षेत्र को प्रभावित नहीं करेंगे बल्कि इसके पार फुकुशिमा से कैलिफोर्निया तक पहुंच सकता है।
चीन का झंडा
- फोटो : Social media
इस फैसले पर दूसरे देशों ने क्या कहा है?
जापान की इस योजना पर मिश्रित प्रतिक्रिया मिली है। अमेरिका ने जापान का समर्थन किया है। विदेश विभाग ने 2021 के एक बयान में कहा था कि जापान अपने निर्णय के बारे में पारदर्शी रहा है और वह विश्व स्तर पर स्वीकृत परमाणु सुरक्षा मानकों का पालन कर रहा है। ताइवान की परमाणु ऊर्जा परिषद ने कहा कि छोड़े जाने वाली ट्रिटियम की मात्रा कम होने का अनुमान है और ताइवान पर प्रभाव न्यूनतम होगा।
हालांकि, जापान के करीबी पड़ोसियों की ओर से इसका काफी विरोध हो रहा है। मार्च में, एक प्रमुख चीनी अधिकारी ने चेतावनी दी थी कि अपशिष्ट जल समुद्री पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को अप्रत्याशित नुकसान पहुंचा सकता है। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड सहित प्रशांत द्वीपों के एक अंतर-सरकारी समूह, प्रशांत द्वीप समूह फोरम के महासचिव ने भी जनवरी में गंभीर चिंताएं व्यक्त की। उन्होंने कहा, 'किसी भी महासागर में छोड़ने की अनुमति देने से पहले अधिक डेटा की आवश्यकता है। हमारा यह कर्तव्य है कि हम आने वाली पीढ़ियों के प्रति यह सुनिश्चित करने के लिए काम करें कि उनका भविष्य सुरक्षित रहे।'
दक्षिण कोरिया के प्रधानमंत्री हान डक-सू ने योजना के लिए समर्थन दिखाया और कहा कि वह अपशिष्ट जल को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप उपचारित करने के बाद पी सकते हैं। हालांकि, बाद में देश के विपक्षी नेता द्वारा बयान का उपहास किया गया।
क्या इसका भारत पर भी कोई असर होगा?
जापान के इस निर्णय के कारण भारतीय समुद्री तटों पर रेडियोएक्टिव कचरे के प्रदूषण का खतरा हो सकता है। नवंबर 2020 में यह फैसला पहली बार लिया गया था। तब विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि इससे एक गलत मिसाल कायम होगी और विश्व के विभिन्न हिस्सों मानवीय और समुद्री जीवन पर इसका घातक असर देखने को मिलेगा।
भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के तत्कालीन महानिदेशक (स्वास्थ्य विज्ञान) एके सिंह के मुताबिक, यह पहला मौका होगा जब समुद्र में भारी मात्रा में रेडियोएक्टिव पानी छोड़ा जाएगा और यह दूसरों को इसका अनुसरण करने के लिए गलत उदाहरण बन सकता है। मानव नस्ल के अस्तित्व के लिए पर्यावरण व स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएं बेहद अहम हैं। इसलिए वैकल्पिक व्यवस्था के लिए वैश्विक स्तर पर बहस हो सकती है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में सहायक प्रोफेसर (एनिस्थीसिया व क्रिटिकल केयर) डॉ. युद्धवीर सिंह का कहना है कि खतरा इस बात पर निर्भर करेगा कि परमाणु जल में प्रदूषक कितनी मात्रा में हैं और उनकी प्रकृति क्या है। सभी तरह के रेडियोएक्टिव आइसोटोप लंबे समय तक शरीर में मौजूद रहने पर कैंसर का कारण बन सकते हैं।