जापान के एक निर्णय के कारण भारतीय समुद्री तटों पर रेडियोएक्टिव कचरे के प्रदूषण का खतरा पैदा हो गया है। जापान ने 2011 की सुनामी में नष्ट हो चुके फुकुशिमा परमाणु संयंत्र के रेडियोएक्टिव दूषित जल को 2022 से धीरे-धीरे करते हुए समुद्र में बहा देने का निर्णय लिया है। यह निर्णय करीब एक साल लंबी बहस के बाद गत 16 अक्तूबर को लिया गया है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इससे एक गलत मिसाल कायम होगी और विश्व के विभिन्न हिस्सों मानवीय और समुद्री जीवन पर इसका घातक असर देखने को मिलेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि परमाणु जल में सीजियम, ट्राइटियम, कोबाल्ट और कार्बन-12 जैसे रेडियोएक्टिव आइसोटॉप्स समेत भारी मात्रा में प्रदूषक मौजूद होंगे, जिनके विघटन में 12 से 30 साल तक का समय लगेगा। यह अपने संपर्क में आने वाली हर चीज को तत्काल नष्ट कर देंगे और मत्स्य उद्योग से जुड़ी अर्थव्यवस्था को संकट में डालने के साथ ही कैंसर समेत विभिन्न प्रकार की बीमारियों के स्पेक्ट्रम को बढ़ावा देंगे।
भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के महानिदेशक (स्वास्थ्य विज्ञान) एके सिंह के मुताबिक, यह पहला मौका होगा, जब समुद्र में भारी मात्रा में रेडियोएक्टिव पानी छोड़ा जाएगा और यह दूसरों को इसका अनुसरण करने के लिए गलत उदाहरण बन सकता है। मानव नस्ल के अस्तित्व के लिए पर्यावरण व स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएं बेहद अहम हैं। इसलिए वैकल्पिक व्यवस्था के लिए वैश्विक स्तर पर बहस हो सकती है।
हालांकि जापानी अधिकारियों का कहना है कि समुद्र में परमाणु जल को छोड़ने से पहले उसका असर कम किया जाएगा और उसमें केवल ट्राइटियम की उपस्थिति होगी, लेकिन इस मुद्दे पर नजर रख रहे अन्य स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इससे होने वाले खतरे को कम नहीं आंकना चाहिए। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में सहायक प्रोफेसर (एनिस्थीसिया व क्रिटिकल केयर) डॉ. युद्धवीर सिंह का कहना है कि खतरा इस बात पर निर्भर करेगा कि परमाणु जल में प्रदूषक कितनी मात्रा में हैं और उनकी प्रकृति क्या है। सभी तरह के रेडियोएक्टिव आइसोटॉप लंबे समय तक शरीर में मौजूद रहने पर कैंसर का कारण बन सकते हैं।
रूस के चेरनोबिल में भी परमाणु लीक दुर्घटना के 20 साल बाद भी थायराइड कैंसर देखने को मिले हैं। उन्होंने कहा, यदि एक बार समुद्र में परमाणु जल छोड़ दिया गया तो उसके बाद मेरी सलाह तटीय इलाकों से दूर रहने और समुद्री खाने का पूरी तरह त्याग कर देने की होगी। उन्होंने चेतावनी दी कि इस सारे मामले में सबसे ज्यादा खतरे में दक्षिण एशियाई देशों के नागरिक रहेंगे।
सेफकास्ट और ग्रीनपीस समेत कई संगठनों और पर्यावरणविदों ने फुकुशिमा संयंत्र की संचालक टोक्यो इलेक्ट्रिक पावर कंपनी (टेप्को) से परमाणु जल को छोड़ने के बजाय ज्यादा स्टोरेज टैंक बनाकर अपने पास सुरक्षित रखने की अपील की है। ग्रीनपीस ने कहा है कि यदि यह पानी पिया गया तो मानवीय डीएनए में बदलाव आ सकता है।
चेरनोबिल के बाद दूसरा सबसे बड़ा परमाणु हादसा था फुकुशिमा
जापान के उत्तर-पूर्वी तटीय इलाके में 11 मार्च, 2011 को 9.0 मैग्नीट्यूड का भूकंप आने के कारण 15 मीटर ऊंची सुनामी की लहरें समुद्र में उठी थीं। इन लहरों ने 5306 मेगावाट क्षमता वाले फुकुशिमा परमाणु संयंत्र को नष्ट कर दिया था। यह इतिहास में रूस के चेरनोबिल में 1986 में हुए हादसे के बाद परमाणु ऊर्जा उत्पादन की दूसरी सबसे बड़ी दुर्घटना थी। दुर्घटना के बाद रिएक्टर में 1000 से ज्यादा टैंकों से छोड़े गए 12 लाख टन रेडियोएक्टिव दूषित जल के कारण फुकुशिमा के आसपास का बहुत बड़ा समुद्री इलाका बंद करना पड़ा था।