तमिलनाडु में ज्यादातर लोगों ने जल्लीकट्टू की वापसी का जश्न मनाया। इस पारंपरिक प्रतियोगिता में लोग सांड़ों से लड़ते हैं और उसे वश में करते हैं। कोर्ट ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया था और इस प्रतिबंध को खत्म करने के लिए तमिलनाडु में व्यापक पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गया था।
हालांकि दलितों का कहना है कि जल्लीकट्टू खेल में उन्हें भाग लेने से अब भी रोका जाता है। कभी-कभी तो यह मामला हिंसक हो जाता है। मदुरई के उत्तर में 60 किलोमीटर की दूरी पर कल्लापुर नाम का एक गांव है। इस गांव में जीवा नगर दलित कॉलोनी के द्वार पर एक देवता को समर्पित एक मंदिर है।
विज्ञापन
इन ट्रॉफियों को दलित टीम ने कबड्डी खेल में जीता है
2 of 9
यह मंदिर ट्रॉफियों और शील्ड से घिरा हुआ है। इन ट्रॉफियों को दलित टीम ने कबड्डी खेल में जीता है। यहां दर्जनों मेडल भी हैं जिनकी चमक मौसम की मार से फीकी पड़ गई है। दलित समुदाय के अलग्गू नाम के एक बुजुर्ग ने कहा, ''इन्हें पिछले तीन सालों में हमारे लड़कों ने जीता है।
यहां जगह खाली करने के लिए पुराने कप और शील्ड हटा दिए गए हैं।'' जीवा नगर से राज्य स्तर के कई कबड्डी खिलाड़ी भी सामने आए, लेकिन जल्लीकट्टू दलितों के लिए प्रतिबंधित है।
'ऊंची जातियों का खेल जल्लीकट्टू'
उन्होंने कहा, ''करीब 40 साल पहले इस गांव के युवाओं ने जल्लीकट्टू में भाग लिया था, लेकिन जब हमारे नौजवानों ने हिन्दू जातियों के सांड़ों को अपने कब्जे में कर लिया तो हिंसक झड़प का सामना करना पड़ा।
विज्ञापन
हालांकि जल्लीकट्टू में हिस्सा नहीं लेने के फैसले से हिंसक झड़प थम नहीं गई
3 of 9
1990 के दशक की शुरुआत में हमारे गांव के बुजुर्गों ने इस खेल में नहीं शामिल होने का फैसला किया। तब से हमलोग लगातार दर्शक की भूमिका में हैं।'' हालांकि जल्लीकट्टू में हिस्सा नहीं लेने के फैसले से हिंसक झड़प थम नहीं गई। 48 साल के कुमार बेघर हैं। इनके पास आय का कोई जरिया नहीं है। 15 जनवरी को इन्हें अज्ञात हमलावरों ने पीटा था। हमलावर जीवा नगर में घुस आए थे।
कुमार ने कहा, ''मेरे कूल्हे और घुटने के जोड़ अलग हो गए हैं। मैं केवल लाठी की मदद से ही चल सकता हूं। मुझे सरकारी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था, जहां एक इंजेक्शन तक नहीं दिया गया। मुझे नहीं पता कि कितने समय तक मैं ऐसे रहूंगा।'' शुरू में कुमार को पता नहीं था कि उन पर हमला क्यों हुआ। हालांकि, बाद में उन्हें इसकी वजह पता चली।
इस खेल के दौरान दलित और हिन्दू जाति के युवाओं के बीच विवाद हुआ
4 of 9
कुमार ने कहा, ''हिन्दू जाति के लोगों ने हमारे गांव में जल्लीकट्टू का आयोजन किया था। इस खेल के दौरान दलित और हिन्दू जाति के युवाओं के बीच किसी बात पर विवाद हुआ। इसी दौरान हिन्दू जाति के लोगों ने हिंसक हमला बोल दिया।'' कई स्थानीय जमींदार हिन्दू जाति व्यवस्था में ऊंची जाति वालों से नीचे हो सकते हैं, लेकिन ये संख्या के मामले में राजनीतिक रूप से शक्तिशाली हैं।
दलित जातीय संरचना में हाशिए पर हैं और ये उनके खेतों में काम करते हैं।
दलितों और गैरदलितों में साफ दीवार
तमिलनाडु के ज्यादातर गावं की तरह कल्लापुर भी दो हिस्सों में बंटा है। दलित और गैरदलितों में साफ लकीर खींची हुई है। जीवा नगर गांव में एक सड़क 200 परिवारों को बाकी बचे गांव से विभाजित करती है।
विज्ञापन
उन्हें दलितों का आगे बढ़ना रास नहीं आता है
5 of 9
रेखा 36 साल की एक मां हैं। जब उनके पड़ोस में तोड़फोड़ हुई तो वह छुपी हुई थीं। रेखा ने कहा, ''वे गाली दे रहे थे और उन्होंने मोटरबाइकों में आग लगा दी। उन्होंने हमारे पानी टैंको में छेद कर दिया, उन्हें जो भी मिला उस पर डंडे से हमला बोला।'' हालांकि यहां असली मामला जल्लीकट्टू का नहीं है।
रेखा ने कहा कि वे हम पर हमला करने के लिए एक बहाना बनाते हैं। उन्हें दलितों का आगे बढ़ना रास नहीं आता है। जल्लीकट्टू प्रतियोगिता सदियों से लोकप्रिय है, लेकिन 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने पशु अधिकारों की रक्षा करने वालों की शिकायत पर इस पर प्रतिबंध लगा दिया था।
विज्ञापन
राज्य सरकार ने न्यायिक प्रतिंबध को खत्म करने के लिए नया कानून बनाया
6 of 9
जनवरी में जल्लीकट्टू के समर्थन में तमिलनाडु में व्यापक विरोध-प्रदर्शन हुआ। जल्लीकट्टू की वापसी के लिए राज्य सरकार ने न्यायिक प्रतिंबध को खत्म करने के लिए नया कानून बनाया। राज्य के दक्षिणी जिलों में यह खेल अब नए उत्साह के साथ खेला जा रहा है।
हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि अन्य सामाजिक मुद्दों को लेकर भी जल्लीकट्टू में जातीय विभेद देखने को मिलता है। इस खेल के समर्थकों का कहना है कि यह उनकी तमिल संस्कृति का हिस्सा है। इस खेल को शक्तिशाली कल्लार जाति का पुख्ता संरक्षण हासिल है। इसी जाति से शशिकला भी आती हैं जो तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बन सकती हैं।
विज्ञापन
इनमें से ज्यादातर लोग सांडों के मालिक या उसके प्रशिक्षक हैं
7 of 9
जमींदारों की अन्य मध्य जातियां भी इस खेल में बड़े उत्साह के साथ शामिल होती हैं। इनमें से ज्यादातर लोग सांडों के मालिक या उसके प्रशिक्षक हैं। इसमें मामूली दलित ही हिस्सा लेते हैं। कल्लारों और दलितों के बीच लंबे समय से शत्रुता रही है। दलित बुद्धिजीवी जल्लीकट्टू को नियंत्रण कायम रखने के लिए जातीय दबदबे के एक उपकरण के रूप में देखते हैं।
जल्लीकट्टू से जुड़ी जातीय हिंसा का अध्ययन करने वाले मदुरई के प्रोफेसर स्टालिन राजनागम ने कहा, ''1980 और 1990 के दशक में जल्लीकट्टू के कारण तमिलनाडु के कई गांवों में हिंसक संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में दलितों का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था। यहां तक कि कई स्थानों पर दलितों की हत्या के मामले भी आए। हिंसा के कारण बड़ी संख्या में दलितों का विस्थापन हुआ। कल्लापुर भी उन्हीं गांवों में से एक है।''
तमिलनाडु जल्लीकट्टू फेडरेशन ने जल्लीकट्टू में जातीय भेदभाव की बात से साफ इनकार किया
8 of 9
हालांकि तमिलनाडु जल्लीकट्टू फेडरेशन ने जल्लीकट्टू में जातीय भेदभाव की बात से साफ इनकार किया है। इस फेडरेशन के नेता डॉ. पी राजशेखरन ने कहा, ''सांडों को इस खेल में कोई भी आ सकता है। इसी तरह कोई भी आदमी सांड़ों को वश में कर सकता है। इस खेल के पहले हम सांड़ों और उसे वश में करने वाले आदमी की सेहत की जांच करते हैं।
किसी से जाति सर्टिफिकेट की मांग नहीं की जाती है।'' जल्लीकट्टू की शुरुआत हमेशा प्रार्थना से होती है। कुछ जगहों पर गांवों के मंदिरों में दलित पुजारी भी हैं। इन जगहों पर इन्हें परंपरा के हिसाब से सम्मान दिया जाता है। पंरपरा के मुताबिक यह सबके साथ किया जाता है।
जल्लीकट्टू में दलितों की प्रतीकात्मक उपस्थिति है क्योंकि इनका आयोजन सरकार करती है
9 of 9
लेकिन प्रोफेसर नागराजम का कहना है कि यह आंशिक सच्चाई है। उन्होंने कहा, ''मदुरई के जल्लीकट्टू में दलितों की प्रतीकात्मक उपस्थिति है क्योंकि इनका आयोजन सरकार करती है और कुछ स्थानों जैसे कि अलांगनल्लुर में दलित बहुसंख्यक हैं। ऐसा बाकी के गांवों में नहीं है। यहां दलितों को जल्लीकट्टू में शामिल होने की अनुमति नहीं है।''
जीवा नगर में ही किसी दलित को खोजना मुश्किल है, जिसने जल्लीकट्टू में हिस्सा लिया हो। नागराजम ने कहा, ''मैदान में छलांग लगाने से पहले अभ्यास की जरूरत पड़ती है। इसके लिए सांड़ की जरूरत पड़ेगी। लेकिन दलित समुदाय में किसी के पास ऐसी हैसियत नहीं है। हिन्दू जातियों के पास सांड़ हैं।
हमलोग उनसे कभी संपर्क नहीं कर सकते क्योंकि हमें पता है कि उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी। मैं जल्लीकट्टू को टीवी पर देखता हूं और सपना है कि दलित भी इस खेल में शरीक हों।''