जलियांवाला बाग हत्याकांड
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अमृतसर के जलियांवाला बाग में बैसाखी पर्व पर एक सभा रखी थी जिसमें आंदोलनकारियों को भाषण देना था। हालांकि शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था, फिर भी इसमें सैंकड़ों लोग ऐसे भी थे, जो आस-पास के इलाकों से बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला देखने और शहर घूमने आए थे और सभा की खबर सुन कर वहां जा पहुंचे थे। इसमें महिलाएं और बच्चे भी थे। जलियांवाला बाग में सभा के शुरू होने तक 10 से 15 हजार लोग इकट्ठा हो गए थे।
उस वक्त जलियांवाला बाग की चारों तरफ बड़ी-बड़ी दीवारें बनी हुई थी और बाहर जाने के लिए सिर्फ एक मुख्य द्वार था। तभी इस बाग के एकमात्र रास्ते से जनरल डायर अपनी सैनिक टुकड़ी के साथ वहां पहुंचा और बिना कोई चेतावनी दिए गोलीबारी शुरू कर दी। वहां मौजूद लोगों ने बाहर निकलने की कोशिश की, लेकिन रास्ता बहुत संकरा था और डायर के फौजी उसे रोककर खड़े थे। इस कारण कोई बाहर नहीं निकल पाया और वहां मौजूद लोग अपनी जान नहीं बचा पाए।
जलियांवाला बाग में जमा लोगों की भीड़ पर 10 मिनट तक कुल 1,650 राउंड गोलियां चलाई गईं। कुछ ही देर में जलियांवाला बाग में बूढ़ों, महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों लोगों की लाशों का ढेर लग गया था। अनाधिकृत आंकड़ों के मुताबित यहां 1000 से ज्यादा लोग मारे गए थे और 2000 से अधिक घायल हुए थे।
जलियांवाला बाग में शहीदी कुआं
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घबराहट में कई लोग जान बचाने के लिए बाग में बने कुंए में कूद पड़े थे। जिसे अब 'शहीदी कुआं' कहा जाता है। यह आज भी जलियांवाला बाग में मौजूद है और उन मासूमों की याद दिलाता है जो अंग्रेजी हुकूमत के जुल्म का शिकार बने थे।
इस जघन्य हत्याकांज की दुनियाभर में निंदा हुई थी। जिसके बाद विश्व दबाव में ब्रिटिश सेक्रेटरी ऑफ स्टेट एडविन मॉटेग्यु ने 1919 के आखिर में इसकी जांच के लिए हंटर कमीशन बनाया था। कमीशन के सामने ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने स्वीकार किया कि वह गोली चलाने का फैसला पहले से ही कर चुका था। हंटर ने कमीशन को यह भी बताया था वह बाग में जमा लोगों पर चलाने के लिए दो तोपें भी ले गया था जो रास्ता संकरा होने की वजह से अंदर नहीं जा पाई थीं।
इस नृशंस हत्याकांड की दुनियाभर में हुई आलोचना के बाद ब्रिटिश सरकार को निंदा प्रस्ताव पारित करना पड़ा और 1920 में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को इस्तीफा देना पड़ा। इस घटना के बाद जनरल डायर ब्रिटेन लौट गए थे क्योंकि उन्हें निलंबित कर दिया गया था।
बताया जाता है कि इस घटना के बाद रवींद्रनाथ टैगोर ने विरोधस्वरूप ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई अपनी उपाधि लौटा दी थी।
जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लेने के लिए 13 मार्च 1940 को ऊधम सिंह लंदन गए। वहां उन्होंने कैक्सटन हॉल में डायर को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। ऊधम सिंह को 31 जुलाई 1940 को फांसी पर चढ़ा दिया गया। उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर का नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया है।
जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह को भीतर तक प्रभावित किया था। बताया जाता है कि जब भगत सिंह को इस हत्याकांड की सूचना मिली तो वह अपने स्कूल से 19 किलोमीटर पैदल चलकर जलियांवाला बाग पहुंचे थे।
उस समय ब्रिटेन में हाउस ऑफ कॉमन्स ने डायर का निंदा प्रस्ताव पारित किया था लेकिन हाउस ऑफ लॉर्ड ने इस हत्याकांड की प्रशंसा करते हुए उसका प्रशस्ति प्रस्ताव पारित किया था।
अब एक बार फिर ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरीजा मे ने ब्रिटिश संसद में जलियांवाला बाग हत्याकांड पर अफसोस जताया है। टेरीजा मे ने कहा, 'जो भी हुआ था और उससे लोगों को जो पीड़ा हुई उसका हमें बेहद अफसोस है।' मे ने इस घटना को ब्रिटिश-भारतीय इतिहास में शर्मनाक दाग बताया।
इससे पहले मंगलवार को इस घटना को लेकर ब्रिटेन सरकार द्वारा माफी मांगने के प्रस्ताव रखा गया था, जिसपर वहां बहस हुई। लगभग सभी सांसदों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया था। हालांकि, ब्रिटिश सरकार के एशिया-प्रशांत क्षेत्र मामलों के मंत्री मार्क फील्ड ने इस घटना को लेकर संसद में संवेदना तो जताई थी, लेकिन माफी मांगने से इनकार कर दिया था।
हाउस ऑफ कॉमंस परिसर के वेस्टमिंस्टर हॉल में आयोजित बहस के दौरान ब्रिटिश विदेश मंत्री मार्क फील्ड ने कहा कि हमें उन बातों की एक सीमा रेखा खींचनी होगी जो इतिहास का 'शर्मनाक हिस्सा' हैं। ब्रिटिश राज से संबंधित समस्याओं के लिए बार-बार माफी मांगने से अपनी तरह की दिक्कतें सामने आती हैं।
फील्ड ने कहा कि वह ब्रिटेन के औपनिवेशिक काल को लेकर थोड़े पुरातनपंथी हैं और उन्हें बीत चुकी बातों पर माफी मांगने को लेकर हिचकिचाहट होती है। उन्होंने कहा कि किसी भी सरकार के लिए यह चिंता की बात हो सकती है कि वह माफी मांगे। इसकी वजह यह भी हो सकती माफी मांगने में वित्तीय मुश्किलें हो सकती हैं। फील्ड ने कहा कि अगर हम माफी मांगते हैं तो कई घटनाओं के लिए मांगनी होगी। इससे मुद्रा भी गिर सकती है।