राफेल विमान समझौते पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सरकार अपनी जीत बता रही है। लेकिन विपक्ष राफेल मामले की ‘उचित जांच’ के लिए जेपीसी के गठन की मांग पर अड़ा है। कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने रविवार को कहा कि राफेल मामले की जांच के लिए जेपीसी ही सबसे उचित फोरम है। केवल जेपीसी के पास ही सभी संबंधित पक्षों को बुलाने और उनसे पूछताछ करने का अधिकार है, इसलिए सरकार को इस मामले की जांच के लिए जेपीसी का गठन करना चाहिए।
वहीं वर्तमान सरकार में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने विपक्ष की इस मांग को अव्यवहारिक बताया। उन्होंने कहा कि जिस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला दे दिया है, उस पर जेपीसी का गठन नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने सवाल किया है कि अगर जेपीसी अपनी जांच में राफेल मामले पर सर्वोच्च अदालत से अलग निष्कर्ष पर पहुंचती है तो किसे सही माना जाएगा? क्या यह एक तरह से सुप्रीम कोर्ट के फैसले का किसी अन्य निकाय के द्वारा समीक्षा करने जैसा नहीं होगा। उनके मुताबिक यह गैरकानूनी होगा।
वहीं देश के वरिष्ठ वकीलों का कहना है कि सरकार की यह दलील बिलकुल गलत है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और इस मामले के याचिकाकर्ता प्रशांत भूषण ने अमर उजाला से कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सरकार द्वारा अपनी जीत बताना सिरे से गलत है। अदालत ने इस मुद्दे पर कोई फैसला दिया ही नहीं है। अदालत ने तो केवल आर्टिकल 32 के तहत यह स्पष्ट किया है कि वह इस मामले में दखल नहीं दे सकती।
उसने राफेल के मूल्यों पर कोई जांच नहीं की है। उन्होंने कहा कि जेपीसी और सर्वोच्च न्यायालय और संसद दोनों अलग-अलग और स्वतंत्र संस्थाएं हैं। दोनों अपने निर्णय पर कोई भी कदम उठाने के लिए स्वतंत्र हैं। उन्होंने कहा कि वे सर्वोच्च न्यायालय में उक्त निर्णय पर पुनर्विचार याचिका दायर करेंगे।
एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता आभा सिंह ने कहा कि संसद के पास इस विषय पर जेपीसी के गठन का अधिकार है। देश की संसद हर मामले में सर्वोच्च है। सुप्रीम कोर्ट उसके द्वारा बनाये गये कानून की सिर्फ संवैधानिक आधारों पर समीक्षा ही कर सकता है। ऐसे में इस विषय पर अगर कोई अलग निष्कर्ष आता भी है तो वह किसी तरह से गैरसंवैधानिक नहीं है। क्योंकि दोनों संस्थाएं स्वतंत्र हैं और आर्टिकल 32, जिसके तहत सर्वोच्च अदालत ने इस मामले की सुनवाई की है, उसमें यह कहीं नहीं कहा गया है कि ऐसे मामलों में वैकल्पिक व्यवस्था नहीं दी जा सकती।