झारखंड सरकार ने सोमवार को कहा कि सरकार मॉब लिंचिंग के मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए राज्य में फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने की योजना बना रही है। संसदीय कार्य मंत्री आलमगीर आलम ने कहा कि 2016 और 2021 के बीच राज्य में मॉब लिंचिंग के कुल 46 मामले दर्ज किए गए हैं। ऐसे 11 मामलों में 51 आरोपियों को सुनवाई पूरी होने के बाद उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। आलम ने कहा कि बाकी मामलों में दोषसिद्धि की प्रक्रिया अलग-अलग चरणों में है।
बगोदर विधायक विनोद कुमार सिंह ने विधानसभा के प्रश्नकाल के दौरान मॉब लिंचिंग का मुद्दा उठाया था और सरकार से ऐसे मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने का आग्रह किया था। सिंह ने पीड़ितों के आश्रितों को मुआवजे के खराब वितरण पर भी चिंता व्यक्त की। पिछले साल दिसंबर में भीड़ द्वारा पीट-पीट कर मार डाले गए सुनील पासी का उदाहरण देते हुए सिंह ने कहा कि उनके परिवार को अभी तक कोई मुआवजा नहीं मिला है।
जवाब में संसदीय कार्य मंत्री ने कहा कि अब तक पीड़ितों के आश्रितों को मुआवजे के रूप में 19.90 लाख रुपये का वितरण किया गया है। हम प्रक्रिया में तेजी लाएंगे। कार्यवाही के दौरान विधानसभा में अधिवास के मुद्दे पर तीखी बहस देखने को मिली। जमशेदपुर (पूर्व) विधायक सरयू राय ने पूछा कि क्या राज्य सरकार की मंशा 1932-खटियान (भूमि अभिलेख) के आधार पर अधिवास नीति बनाने की है।
आलम ने जवाब में कहा कि मुख्यमंत्री पहले ही इस मामले में जवाब दे चुके हैं। इस मुद्दे पर आकलन किया जा रहा है और सरकार जल्द ही कोई फैसला लेगी। इस मुद्दे पर आजसू प्रमुख सुदेश महतो, विधायक प्रदीप यादव और झामुमो विधायक जय प्रकाश भाई पटेल ने बहस की। उन्होंने निर्णय पर पहुंचने के लिए सरकार से समय सीमा मांगी।