सूत्रों के मुताबिक, लंबे समय से आईटीबीपी हिमवीरों को तय भत्तों के भुगतान को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। वे इन भत्तों से संबंधित बिलों को तय समय पर विभागीय प्रक्रिया के माध्यम से जमा करा देते हैं, लेकिन बाद में इन पर कोई कार्यवाही नहीं होती। इस बाबत हिमवीर अपने विभाग से आग्रह करते हैं कि बिलों का भुगतान अविलंब कराया जाए। विभाग की तरफ से हिमवीरों की बात को आगे रखा जाता है, मगर उसके बावजूद बिलों की फाइलों को मंजूरी नहीं मिल पाती।
अगर बिलों से जुड़ी कुछ फाइलों को मंजूरी मिलती है तो वह भी कछुआ गति से। आईटीबीपी डीआईजी ने उप मुख्य लेखा नियंत्रक, वेतन एवं लेखा कार्यालय को भेजे पत्र में कहा है, मौजूदा समय में शिशु शिक्षा भत्ते के लगभग 900 बिल लंबित पड़े हैं। इसी तरह हार्डशिप भत्ते से संबंधित 1800 से अधिक बिल लेखा कार्यालय में लंबित हैं। इन बिलों को मंजूरी न मिल पाने के कारण विभिन्न यूनिटों से शिकायतें प्राप्त हो रही हैं।
तय समय पर भत्तों का भुगतान न होने से जवानों को वित्तीय समस्याओं का सामना करना पड़ता है। साथ ही उक्त भत्तों के लिए जो बजट तय होता है, वह खर्च नहीं हो पाता। गत नवंबर माह के दौरान शिशु शिक्षा भत्ते से जुड़े केवल 143 बिलों का भुगतान हुआ है। रिस्क एवं हार्डशिप के भत्तों से जुड़ी फाइलें भी आगे नहीं सरक रहीं। कछुआ गति से अगर ये फाइलें आगे बढ़ेंगी तो चालू वित्तीय वर्ष में लंबित बिलों का भुगतान नहीं हो सकेगा। भविष्य में भी जवानों के ऐसे बिलों को स्वीकृति मिलने में अनावश्यक देरी होगी।
एरियर बिलों के भुगतान में विलंब होने के कारण आईटीबीपी की फील्ड फार्मेशनों में तैनात जवानों को वित्तीय समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इतना ही नहीं, जब इन बिलों का भुगतान नहीं होता है तो केंद्रीय अभिलेख कार्यालय की छवि प्रभावित होती है। आईटीबीपी के डीआईजी संजीव सिंह की तरफ से आग्रह किया गया है कि लंबित पड़े बिलों का भुगतान अतिशीघ्र किया जाए। इससे जवानों की वित्तीय समस्या दूरी होगी, वहीं तय बजट को खर्च करने का लक्ष्य भी पूरा हो सकेगा।