भारत अब अंतरिक्ष आधारित निगरानी की क्षमताओं को बढ़ा रहा है। इसके तहत अगले पांच वर्षों में 52 उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। इस मिशन में निजी क्षेत्र की अहम भागीदारी होगी। यह जानकारी भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (इन-स्पेस) के प्रमुख पवन कुमार गोयनका ने दी।
गोयनका ने पीटीआई से बातचीत में कहा, हमारे पास पहले से ही अच्छी क्षमताएं हैं, लेकिन इन्हें लगातार मजबूत करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अगले पांच वर्षों में कुल 52 उपग्रह लॉन्च किए जाएंगे, जिससे रक्षा क्षेत्र के लिए निगरानी क्षमताओं को बढ़ाया जा सकेगा। उन्होंने कहा, अब तक यह काम खासतौर पर इसरो करता था, लेकिन अब हम निजी क्षेत्र को भी इसमें जोड़ेंगे, ताकि निगरानी क्षमताओं में और सुधार किया जा सके।
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ये उपग्रह भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना को दुश्मन की गतिविधियों, सीमाओं की निगरानी और युद्ध के समय रीयल टाइम में समन्वय बेहतर बनाने में मदद करेंगे। गोयनका ने बताया, इन 52 उपग्रहों में से आधे निजी कंपनियों द्वारा बनाए जाएंगे, जबकि बाकी इसरो बनाएगा।
गोयनका ने स्पष्ट किया कि निगरानी क्षमताओं को और बढ़ाने के फैसले केंद्रीय गृह मंत्रालय और रक्षा बलों को लेने होंगे। उन्होंने यह भी बताया कि इसरो अभी एसएसएलवी (शॉर्ट सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल) की तकनीक को निजी क्षेत्र में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया में है।
एसएसएलवी क्या है?
एसएसएलवी को कम समय में और कम लागत पर छोटे उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजने के लिए डिजाइन किया गया है। यह क्षमता रक्षा बलों के लिए आपात स्थिति में उपयुक्त होती है। एसएसएलवी ऐसे लॉन्च व्हीकल होते हैं जो 10 किलो से 500 किलो तक के वजन के उपग्रहों को 500 किमी की गोलाकार कक्षा में स्थापित कर सकते हैं।
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एसएसएलवी तीन चरणों वाला लॉन्च व्हीकल है, जिसमें सभी चरणों में ठोस ईंधन का उपयोग होता है और अंतिम चरण में तरल ईंधन आधारित वेलोसिटी ट्रिमिंग मॉड्यूल (वीटीएम) होता है। इसके डिजाइन में कम लागत, कम समय में तैयार होने, कई उपग्रहों को एक साथ ले जाने में आसानी, मांग के अनुसार लॉन्च करने की सुविधा पर खास ध्यान दिया जाता है। गोयनका ने कहा, एसएसएलवी की तकनीक का स्थानांतरण अब करीब है। उन्होंने संकेत दिया कि इसकी घोषणा अगले दो हफ्तों में की जा सकती है।