बता दें कि चंद्रमा पर लैंडिंग के दौरान सतह से केवल 2.1 किमी ऊपर लैंडर विक्रम से इसरो का संपर्क टूट गया था। जिससे वह रास्ता भटककर अपने निर्धारित जगह से लगभग 500 मीटर की दूरी पर चंद्रमा की सतह से टकरा गया था। जिसके बाद चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर ने रविवार को लैंडर विक्रम की थर्मल इमेज इसरो को भेजी थी।
इसरो के वैज्ञानिकों का कहना है कि लैंडर विक्रम एक तरफ झुका दिखाई दे रहा है, ऐसे में कम्युनिकेशन लिंक वापस जोड़ने के लिए यह बेहद जरूरी है कि लैंडर का ऐंटीना ऑर्बिटर या ग्राउंड स्टेशन की दिशा में हो। हमने इससे पहले जियोस्टेशनरी ऑर्बिट में गुम हो चुके स्पेसक्राफ्ट का पता लगाया है लेकिन यह उससे काफी अलग है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने मंगलवार को एक बार फिर कहा कि लैंडर विक्रम से संपर्क साधने की सभी कोशिशें जारी है। अतंरिक्ष एजेंसी ने इसे लेकर ट्वीट करते हुए लिखा, चंद्रयान 2 के ऑर्बिटर ने विक्रम लैंडर को ढूंढ लिया है लेकिन अभी तक उससे कोई संपर्क नहीं हो पाया है। लैंडर के साथ संचार स्थापित करने के लिए सभी संभव प्रयास किए जा रहे हैं।
सोमवार को इसरो ने बताया था कि चंद्रमा की सतह पर हार्ड लैंडिंग करने के बावजूद चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम में कोई टूट-फूट नहीं हुई है। ऑर्बिटर द्वारा भेजे गए चित्र के अनुसार यह एक ही टुकड़े के रूप में दिखाई दे रहा है। इसरो की टीम चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम के साथ संपर्क स्थापित करने की कोशिशों में लगी हुई है।
एक वैज्ञानिक ने कहा कि हम विक्रम से संपर्क करने की लगातार हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। अभी हमने उम्मीद नहीं छोड़ी है। चांद की सतह से महज 2.1 किमी दूर रहने के दौरान ही लापता विक्रम को इसरो ने रविवार को ऑर्बिटर की मदद से खोज निकाला था। विक्रम को सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करनी थी, मगर उसे हार्ड लैंडिंग का शिकार होना पड़ा।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 2,379 किलोग्राम वजनी ऑर्बिटर का मिशन काल एक साल तय किया था, लेकिन अब यह लगभग सात साल तक काम कर सकता है। इसरो के एक अधिकारी ने कहा, ऑर्बिटर में पर्याप्त ईंधन मौजूद है। यान को चांद की कक्षा में प्रवेश कराने तक हमने किसी त्रुटि का सामना नहीं किया। अतिरिक्त ईंधन का बिलकुल भी इस्तेमाल नहीं किया गया। हर चीज योजना के अनुरूप हुई। हमारे पास (ऑर्बिटर में) अतिरिक्त ईंधन मौजूद है।
अगर चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम की चांद की सतह पर लैंडिंग उसी तरह से हो जाती जैसे सोची गई थी, तो चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की सतह पर अंतरिक्षयान उतारने वाला भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बन जाता।
दरअसल, भारत ने इसके लिए सॉफ्ट लैंडिंग करवाने की योजना बनाई थी। अमेरिका, रूस और चीन इससे पहले चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करवा चुके हैं, लेकिन चांद के दक्षिणी ध्रुव पर अब तक कोई भी ऐसा नहीं कर सका है। इसके पीछा का कारण यह है कि वहां की परिस्थितियां लैंडिंग के लिए काफी जटिल हैं।
लैंडर विक्रम की असफल लैंडिंग से इसरो, इसरो के वैज्ञानिक और देश के नागरिक चिंतित जरूर हुए, लेकिन इस मिशन को असफल कहना बड़ी भूल होगी। चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर चांद की कक्षा में अपना काम कर रहा है। इस ऑर्बिटर में कई वैज्ञानिक उपकरण हैं जो ठीक से काम कर रहे हैं। कहीं, अगर इसरो को लैंडर से संपर्क स्थापित करने में सफलता मिल गई तब तो इस मिशन की सफलता पर पक्की मुहर लग जाएगी।