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नवाज शरीफ की पार्किंग में खड़ी कारों को गिन सकते हैं हमारे सैटेलाइट

Mon, 03 Oct 2016 05:53 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : Getty Images file
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पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकियों के लॉन्च पैड पर सेना की ओर से की गई सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान आकाश में उड़ रहे उपग्रहों से भी जवानों को खूब मदद मिली। पाकिस्तान की नजरों से दूर आकाश में उड़ रहे आधा दर्जन 'मेटॉलिक बर्ड्स' ने भारतीय सेना के मिशन की तैयारी और उसे अंजाम देने में पूरी मदद की है। 
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अंग्रेजी अखबार इकोनॉमिक टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक भारत इस क्षेत्र में अपनी क्षमता को बढ़ाने के लिए C4ISR को विकसित कर रहा है। C4ISR यानी कमांड, कंट्रोल, कम्युनिकेशन्स, कम्प्यूटर, इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसन्स। भारत पहले ही एक एयरोस्पेस कमांड बना चुका है और 'सर्जिकल स्ट्राइक्स' को समझने वाले विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके जरिए आधी रात को हमले करने की तैयारी और उसे अंजाम देने के लिए यह कमांड महत्वपूर्ण है। 

इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइेशन यानी इसरो युद्ध नहीं लड़ती और पूरी तरह से एक सिविलियन एजेंसी हैं, लेकिन इसने देश को जो क्षमताएं दी हैं, वो दुनिया में श्रेष्ठ हैं। इसरो न केवल पाकिस्तान में मौजूद आतंकियों और उनके ठिकानों को गिद्ध दृष्टि से देखती है बल्कि इन ठिकानों को नष्ट करने के लिए सेना को नेविगेशन सिग्नल भी उपलब्ध कराती है। इसरो ने ऐसा ढांचा विकसित किया है, जो दिन या रात किसी भी समय जवानों की मदद करता है। 
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बहुत सारे भारतीयों को इन क्षमताओं के बारे में पता नहीं है और यह सब इसरो के पोर्टल में छिपा है, क्योंकि मंगलयान और चंद्रमा मिशन सारा लाइमलाइट खींच लेते हैं। दूसरी ओर इसरो की 17000 हजार वैज्ञानिकों की टीम खामोशी के साथ सीमाओं की रक्षा में जवानों की मदद के लिए दिन रात काम करती है। 

इसरो के पूर्व चेयरमैन के कस्तूरीरंगन ने कहा, 'स्पेस एजेंसी के पास शानदार तकनीक है और इसका पूरा लाभ उठाया जा रहा है। हाई रेज्योलूशन सैटेलाइट की तस्वीरें शहरी योजना बनाने में भी मदद कर सकती है और आतंकियों के ठिकानों पर भी निगाह रख सकती है।'

कस्तूरीरंगन ने कहा कि सैटेलाइट की तस्वीरें दोस्त और दुश्मन में अंतर नहीं करती हैं। ये तय करने का अधिकार उसके यूजर को है। 

एशिया प्रशांत क्षेत्र में 33 सैटेलाइट्स का नक्षत्र

- फोटो : Getty Images
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में सेना की सर्जिकल स्ट्राइक में इसरो ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और आने वाले सालों में भारतीय स्पेस एजेंसी के संसाधन सीमा पर युद्ध की स्थिति को खत्म करने में बड़ी भूमिका निभाएंगे। इसरो के चेयरमैन किरण कुमार ने कहा कि इसरो देश के हितों की रक्षा में किसी भी योगदान से पीछे नहीं हटेगा। 

भारत के पास इस समय पृथ्वी की कक्षा में 33 सैटेलाइट और एक सैटेलाइट मंगल के ऑर्बिट में हैं। इन सबमें 12 कम्युनिकेशन सैटेलाइट, 7 नेविगेशन सैटेलाइट, 10 अर्थ (पृथ्वी) ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट और 4 मौसम की निगरानी से जुड़े सैटेलााइट हैं। एशिया प्रशांत क्षेत्र में यह सबसे बड़ा सैटेलाइट नक्षत्र है। बता दें कि हर सैटेलाइट एक खास उद्देश्य के लिए तैयार किया गया है और यह भारत के राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा में जरूरी मदद करता है। 

भारत के पास दुनिया के बेहतरीन सैटेलाइट हैं और इनमें 22 जून को लॉन्च किए कार्टोसैट 2 सीरीज के सैटेलाइट महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। कार्टोसैट 2 सीरीज के सैटेलाइट पाकिस्तान में मौजूद छोटी से छोटी चीज को देख सकते हैं और नवाज शरीफ की पार्किंग में खड़ी कारों को भी गिन सकते हैं। 0.65 रेज्योलूशन के साथ यह हर 90 मिनट पर पृथ्वी का एक चक्कर लगाता है और पाकिस्तान में मौजूद एक-एक टैंक, ट्रक और फाइटर एयरक्राफ्ट को गिन सकता है, चाहे वह पाकिस्तान में कहीं भी खड़े हो। 

अल्ट्रा शॉर्प सैटेलाइट की खूबियां बताते हुए किरन कुमार ने कहा कि कार्टोसैट-2 की खासियत यह है कि यह 1 मिनट का वीडियो भी बना सकता है। और इस वीडियो में यह 1 सेकेंड में 37 किलोमीटर की दूरी तय करता है और आने वाले सालों में इसके रेज्योलूशन की क्षमता 25CM होगी। 

चीन के पास भी नहीं है ये तकनीक

इसरो के पूर्व चेयरमैन माधवन नायर - फोटो : Getty Images
इसरो के पूर्व चेयरमैन माधवन नायर ने कहा कि चीन के पास भी ऐसी तकनीक नहीं है। ड्रैगन देश के पास जो तकनीक है वह 5-m की है, जबकि पाकिस्तान के पास इस तरह की कोई क्षमता नहीं है। 

नायर ने कहा कि भारत ने स्पेस इमेजिंग टेक्नोलॉजी में जबरदस्त पैसा लगाया है और अब पूरा फायदा उठा रहा है। यहीं नहीं भारत के पास रीसैट-1 और रीसैट-2 के रूप में ऐसे उपग्रह हैं, जो दिन या रात कहीं भी देख सकते हैं। इन उपग्रहों को सिंथेटिक अपर्चर सैटेलाइट कहते हैं। 

इसी साल 28 अप्रैल को लॉन्च किए गए नाविक सैटेलाइट के जरिए नेविगेशन तकनीक में भारत के पास 20-m की क्षमता है, जो अमेरिका के जीपीएस सिस्टम से भी बेहतर है। इसके जरिए भारत सीमा के आर पार 1500 किलोमीटर तक देख सकता है। 

नेविगेशन सिग्नल 24 घंटे काम करता है और केवल अमेरिका और रूस के पास ही इस तरह की क्षमता है, चीन भी इस मामले में पीछे है और अभी अपना नेविगेशन सिस्टम तैयार कर रहा है। 

इसके अलावा भारत के पास जीसैट-6 उपग्रह भी हैं, जो दो दिशाओं में एक साथ वीडियो बना सकते है और इसके पास 6m के व्यास वाला एंटीना है, जो 21वीं सदी में नेटवर्क आधारित युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। 
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जीसैट 6-A सैटेलाइट से लैस टेलीफोनिक हैंडसेट

- फोटो : Getty Images file
गौरतलब है कि ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के समय बराक ओबामा ने उपग्रहों की मदद से सेना की कार्रवाई का लाइव वीडियो देखा था। भारत अपने GSAT-6 और GSAT 6A की मदद से अपने पड़ोसियों के रिमोट इलाकों से भी लाइव वीडियो हासिल कर सकता है। 

एयरोस्पेस कमांड के सूत्रों का कहना है कि भारत जल्द ही इस तकनीक के उपयोग को हासिल कर लेगा और इसका उपयोग सामान्य जगहों पर भी हो सकता है। माधवन नायर ने कहा कि भारत अभी सैटेलाइट टेलीफोन के लिए थुराया हैंडसेट पर निर्भर है, लेकिन जल्द ही डीआरडीओ जीसैट-6 तकनीक से लैस भारतीय हैंडसेट उपलब्ध कराएगा। नायर जोर देकर कहते हैं कि भारत के पास जल्द ही जीसैट 6-A सैटेलाइट टेलीफोनिक हैंडसेट भी होंगे और यह बड़ी कामयाबी होगा। 

सिर्फ थलसेना के लिए ही नहीं इसरो ने नौसेना की डिमांड पर रूक्मिनी सैटेलाइट को लॉन्च किया है। इसके जरिए विजुअल रेंज से बाहर होने पर नौसेना के जहाज सुरक्षित तरीके से आपस में जुड़े रह सकते हैं। 

आने वाले सालों में इसरो एयरफोर्स के लिए भी एक सैटेलाइट लॉन्च करेगा। इन सबके बीच अपने संसदीय दायित्वों को निभाते हुए भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसरो के रॉकेट लॉन्चिंग पर खासतौर से नजर रखते हैं। प्रधानमंत्री को पता है कि स्पेस संसाधनों को कहां और कैसे तैनात करना है ताकि कोई दुश्मन हमारी सरहदों की ओर निगाह भी ना उठा सके। 
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