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ISRO: सेमी-क्रायोजेनिक इंजन के विकास को लेकर भारत-रूस में होगा समझौता, इसरो के मानव मिशनों को मिलेगा फायदा

Sat, 02 May 2026 03:11 PM IST
Riya Dubey एएनआई, नई दिल्ली

सार

इसरो ने Roscosmos के साथ सेमी-क्रायोजेनिक इंजन की आपूर्ति पर मॉस्को में तकनीकी चर्चा की है और ड्राफ्ट कॉन्ट्रैक्ट मंजूरी के चरण में है। यह इंजन भारत के हैवी-लिफ्ट रॉकेट्स के लिए अहम है, जिससे ज्यादा थ्रस्ट और बेहतर दक्षता मिलेगी। आइए विस्तार से जानते हैं।
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सेमी-क्रायोजेनिक इंजन - फोटो : ANI
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विस्तार
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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो (ISRO) ने रूस की अंतरिक्ष एजेंसी Roscosmos के साथ सेमी-क्रायोजेनिक इंजनों की आपूर्ति को लेकर मॉस्को में विस्तृत तकनीकी चर्चा की है। इसरो की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 के अनुसार, इस संबंध में एक ड्राफ्ट कॉन्ट्रैक्ट तैयार किया जा चुका है, जो फिलहाल मंजूरी प्रक्रिया में है।

भारत के लिए क्यों है जरूरी?

सेमी-क्रायोजेनिक इंजन भारत के भविष्य के हैवी-लिफ्ट लॉन्च व्हीकल्स के लिए बेहद महत्वपूर्ण तकनीक मानी जा रही है। यह इंजन केरोसीन और लिक्विड ऑक्सीजन के संयोजन पर काम करता है, जिससे अधिक थ्रस्ट और बेहतर दक्षता मिलती है। इसके विकास और उपयोग से भारत की क्षमता भारी पेलोड लॉन्च करने और डीप स्पेस मिशनों को अंजाम देने में काफी मजबूत होगी।

इसरो स्वदेशी सेमी-क्रायोजेनिक इंजन कार्यक्रम पर कर रहा काम

इसरो पहले से ही अपने स्वदेशी सेमी-क्रायोजेनिक इंजन कार्यक्रम पर काम कर रहा है, लेकिन Roscosmos के साथ सहयोग से इस तकनीक के विकास में तेजी आने और महत्वपूर्ण तकनीकी चुनौतियों को दूर करने की उम्मीद है। हालांकि, रिपोर्ट में इंजन की डिलीवरी या अंतिम समझौते की समयसीमा का जिक्र नहीं किया गया है, लेकिन बातचीत के उन्नत चरण में पहुंचने के संकेत मिले हैं।

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इसरो ने इससे पहले 28 मार्च 2025 को तमिलनाडु के महेंद्रगिरि स्थित इसरो प्रोपल्शन कॉम्प्लेक्स में सेमी-क्रायोजेनिक इंजन (SE2000) के पावर हेड टेस्ट आर्टिकल का सफल हॉट टेस्ट किया था। यह 2000 किलोन्यूटन थ्रस्ट वाला इंजन LVM3 रॉकेट के सेमी-क्रायोजेनिक बूस्टर स्टेज को शक्ति देगा और मौजूदा L110 स्टेज की जगह लेगा, जिससे पेलोड क्षमता 4 टन से बढ़कर 5 टन तक हो सकती है।

क्या है इस इंजर का उपयोग?

इस इंजन में नॉन-टॉक्सिक प्रोपेलेंट (लिक्विड ऑक्सीजन और केरोसीन) का उपयोग किया जाता है, जो इसे अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाता है। इसकी जटिल तकनीक जैसे ऑक्सीडाइजर-रिच स्टेज्ड कंबशन साइकिल और 180 बार चैंबर प्रेशर दुनिया के सीमित देशों के पास ही उपलब्ध है।

रूस के साथ यह सहयोग इसरो की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों का हिस्सा है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि भारत के प्रस्तावित वीनस ऑर्बिटर मिशन में रूस का स्पेस रिसर्च इंस्टीट्यूट एक पेलोड पार्टनर के रूप में शामिल होगा। इस मिशन का उद्देश्य शुक्र ग्रह के वातावरण, सतह और सौर प्रभावों का अध्ययन करना है।

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इसरो विभिन्न देशों के साथ मानव अंतरिक्ष उड़ान, सैटेलाइट नेविगेशन और पृथ्वी अवलोकन जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ा रहा है, जिससे भारत की अंतरिक्ष क्षमताओं को वैश्विक स्तर पर नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।
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