पीएसएलवी मिशन की विफलता की जांच के लिए समिति गठित
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष वी नारायणन ने कहा कि पीएसएलवी मिशन की विफलता की जांच के लिए एक समिति गठित की गई है। समिति ने नाकामी के कारणों को जानने के लिए कई दौर की चर्चा की है।
इसरो प्रमुख नारायणन ने कही ये बात
नारायणन ने कहा कि श्रीहरिकोटा से हमारा 101वां मिशन था। रॉकेट चार चरणों वाला यान है। पहले चरण में 134 टन का ठोस प्रणोदन सिस्टम है और इसमें छह स्ट्रैप-ऑन मोटर हैं, जिनमें से प्रत्येक में 12 टन प्रणोदक है। दूसरे चरण में 40 टन का तरल प्रणोदन सिस्टम है, तीसरे चरण में 8 टन का ठोस प्रणोदन सिस्टम है और चौथे चरण में भी तरल प्रणोदन का उपयोग किया जाता है। उपग्रह को कक्षा में स्थापित करने के लिए इन चार चरणों को एक साथ मिलकर काम करना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि समस्या के मूल कारण की पहचान करने के लिए समिति बनाई गई है और हमने इस पर कई दौर की चर्चा की है। एक बार जब हम मूल कारण की पहचान कर लेंगे, तो हम इसके पीछे के कारण के बारे में बताएंगे। उन्होंने कहा कि यह दुखद है कि मिशन पूरा नहीं हो सका। साथ ही उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष एजेंसी अपने आगामी प्रक्षेपणों पर आगे बढ़ेगी। हमने इस साल हर महीने एक मिशन की योजना बनाई है।
क्या हुआ मिशन के दौरान?
पीएसएलवी-सी61 रॉकेट को आंध्र प्रदेश के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया गया था। यह पीएसएलवी रॉकेट का 63वां और एक्सएल कॉन्फिगरेशन में 27वां मिशन था। शुरूआती दो चरणों में सब कुछ सामान्य था। लेकिन जब तीसरे चरण ने काम करना शुरू किया, तभी एक तकनीकी समस्या सामने आई।
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क्या थी ईओएस-09 सैटेलाइट?
जानकारी के मुताबिक, ईओएस-09 से वास्तविक समय में मिलने वाली सटीक जानकारी कृषि, वानिकी निगरानी, आपदा प्रबंधन, शहरी नियोजन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अनुप्रयोगों के लिए महत्वपूर्ण साबित होती। इस मिशन का उद्देश्य देश भर में विस्तारित तात्कालिक समय पर होने वाली घटनाओं की जानकारी जुटाने की आवश्यकता को पूरा करना था। इसरो के मुताबिक, करीब 1,696.24 किलोग्राम वजन वाला पृथ्वी अवलोकन उपग्रह-09 वर्ष 2022 में प्रक्षेपित ईओएस-04 जैसा ही है। ईओएस-09 की मिशन अवधि पांच वर्ष थी। वहीं उपग्रह को उसकी प्रभावी मिशन अवधि के बाद कक्षा से बाहर निकालने के लिए पर्याप्त मात्रा में ईंधन आरक्षित किया गया था, ताकि इसे दो वर्षों के भीतर कक्षा में नीचे उतारा जा सके, जिससे मलबा-मुक्त मिशन सुनिश्चित रहे।
पीएसएलवी रॉकेट के चरण कैसे काम करते हैं?
- पीएसएलवी (पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल) एक चार-चरणीय रॉकेट होता है:
- पहला और तीसरा चरण – ठोस ईंधन से चलते हैं
- दूसरा और चौथा चरण – तरल ईंधन से चलते हैं
- तीसरा चरण सैटेलाइट को ऊपरी वायुमंडल में सही कक्षा की दिशा में ले जाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसी चरण में गड़बड़ी आई और सैटेलाइट तय कक्षा तक नहीं पहुंच पाया।
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क्या पीएसएलवी अब भरोसेमंद नहीं रहा?
इसरो के पीएसएलवी रॉकेट ने अब तक 60 से ज्यादा सफल उड़ानें भरी हैं और कई देशों के सैटेलाइट अंतरिक्ष में पहुंचाए हैं। यह रॉकेट इसरो का एक मजबूत स्तंभ रहा है। वहीं इसकी इस असफलता को लेकर जानकारों का मानना है कि, एक-दो असफलताओं से पीएसएलवी रॉकेट की साख पर बट्टा नहीं लगेगा।