चार महाद्वीपों के 57 देशों की सदस्यता वाले ओआईसी को वैश्विक कूटनीति में संयुक्त राष्ट्र संघ के बाद दूसरे सबसे बड़े संगठन का दर्जा हासिल है। इस संगठन की कही हुई बात को पूरे मुस्लिम समुदाय की संयुक्त राय का दर्जा दिया जाता है। अभी तक कश्मीर मुद्दे पर ओआईसी की तरफ से पाकिस्तान के रुख का समर्थन किया जाता रहा है और कश्मीरियों की तथाकथित आजादी की मांग के समर्थन में यह संगठन 2017 में संकल्प प्रस्ताव भी पारित कर चुका है। ऐेसे में भारत को विशिष्ट अतिथि के तौर पर आमंत्रित कर अपना पक्ष ओआईसी के सदस्य देशों के सामने रखने का मौका देने को इस संगठन के रुख में थोड़ी नरमी का प्रतीक माना जा सकता है।
ओआईसी की सदस्यता मुस्लिम बहुल देशों के लिए आरक्षित है, लेकिन रूस, थाईलैंड और कुछ अन्य छोटे देशों को उसकी तरफ से ऑब्जर्वर का दर्जा दिया गया है। पिछले साल मई में ढाका में हुए विदेश मंत्री परिषद के 45वें सम्मेलन में बांग्लादेश ने मेजबान के तौर पर भारत को इस संगठन की सदस्यता देने का प्रस्ताव रखा था। बांग्लादेश ने इसके लिए देश की आबादी में मुस्लिम समुदाय की 10 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी का तर्क दिया था, लेकिन पाकिस्तान के विरोध के कारण यह प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया था।