मार्च में केंद्र सरकार ने मल्टी डिसिप्लिनरी टेरर मॉनीटरिंग ग्रुप (एमडीटीएमजी) का गठन किया था। इसका मकसद जम्मू-कश्मीर में आतंकियों को मिलने वाली वित्तीय मदद को रोकना और उनकी गतिविधियों पर नजर रखना था। गृह मंत्रालय के निर्देशन में काम करने वाले इस ग्रुप में जम्मू-कश्मीर पुलिस, आईबी, सीबीआई, एनआईए, इनकम टैक्स और ईडी जैसी एजेंसियों को शामिल किया गया था।
जम्मू-कश्मीर में एडीजी स्तर के एक अधिकारी सप्ताह में इस समूह की बैठक लेते हैं। इस समूह की मदद से आतंकियों को किसी भी तरह की मदद पहुंचाने वाले जैसे शिक्षक, राजस्व विभाग के कर्मी, स्थानीय नेता, अलगाववादी या कोई अन्य संस्थाओं पर दबिश दी जा रही है। एनआईए दो माह से लगातार छापेमारी कर रही है। केंद्रीय गृह मंत्रालय में ज्वाइंट डायरेक्टर स्तर के अधिकारी रोजाना इस ग्रुप की गतिविधि पर नजर रख रहे हैं।
हर छोटी-बड़ी सूचना को आईबी के मल्टी एजेंसी सेंटर में साझा करने के अलावा गृह मंत्री अमित शाह को भी उससे अवगत कराया जा रहा है। इस ग्रुप में अब निचले स्तर तक की इंटेलीजेंस रिपोर्ट भी साझा हो रही है। स्कूल, कॉलेज और ग्राम पंचायतों जैसी संस्थाओं में आतंकियों को लेकर सरकार की नीति और अनुच्छेद 35-ए के संशोधन पर उनकी राय जैसी सूचनाएं भी नियमित तौर से गृह मंत्रालय में पहुंच रही हैं।
नए जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 35 को लेकर कुछ होगा या फिर वहां पर विधानसभा की सीटें बढ़ाई जाएंगी। अनुच्छेद-35 का मामला तो सुप्रीम कोर्ट में जा चुका है, जबकि राज्य के भाजपा नेताओं ने जल्द से जल्द परिसीमन कराने की अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। भाजपा नेताओं का कहना है कि राज्य में परिसीमन अब समय की मांग है।
अगर मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में परिसीमन होता है तो जम्मू-कश्मीर के अलावा लद्दाख क्षेत्र के साथ भी न्याय हो सकेगा। वहां पर विधानसभा की कई नई सीटें बन सकती हैं। जम्मू-कश्मीर में विधानसभा की 111 सीटें हैं। मौजूदा स्थितियों में केवल 87 सीटों पर चुनाव लड़ा जाता है। वहां के संविधान के धारा-47 के अनुसार, 24 सीटों पर चुनाव नहीं होता है।
बता दें कि जब जम्मू-कश्मीर का संविधान बना तो 24 सीटें पाक अधिकृत कश्मीर के लिए खाली छोड़ी गई थीं। राज्य के भाजपा नेताओं ने परिसीमन को लेकर जो रिपोर्ट दी है, उसमें इन्हीं 24 सीटों का जिक्र है। यदि ये सीटें विधानसभा में मिलती हैं तो उसका फायदा भाजपा को होगा।
दूसरा, अनुच्छेद 35-ए है। यह जम्मू-कश्मीर विधानसभा को राज्य के 'स्थायी निवासी' की परिभाषा तय करने का अधिकार देता है। इसके तहत जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को कुछ खास अधिकार दिए गए हैं। साल 1954 में इसे राष्ट्रपति के आदेश के माध्यम से संविधान में जोड़ा गया था। अब इसमें संशोधन या इसे खत्म करने की चर्चा है।