चीन लद्दाख में फिंगर प्वाइंट 4, पेट्रोलिंग प्वाइंट 14 और पैगोंग त्सो क्षेत्र से अपनी फौज को पीछे ले जाने के लिए तैयार नहीं हो रहा है। सैन्य कमांडरों और राजनयिक चैनल से होने वाली बातचीत इसको लेकर बहुत कड़वे दौर से गुजर रही है। हालांकि अभी राजनयिक स्तर पर ही कई लेवेल की बातचीत का विकल्प है। इसके साथ-साथ राजनीतिक स्तर का सर्वोच्च फोरम भी है।
भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी देश से जुड़े तमाम मुद्दों पर बारीक निगाह रखते हैं। वह केंद्र सरकार को जहां आर्थिक स्थिति के लिए चेताते रहते हैं, वहीं उन्होंने हाल में भारत-नेपाल संबंध को लेकर भी ट्वीट करके द्विपक्षीय रिश्ते के जटिल मोड़ पर पहुंचने का संकेत किया था। अब सुब्रमण्मय स्वामी ने भारत-चीन रिश्ते में तनाव बढ़ने की तरफ ईशारा किया है। सुब्रमण्यम स्वामी ने विदेश मंत्रालय से स्थिति साफ करने के लिए कहा है।
उन्होंने ट्वीट करके सूत्रों के हवाले से जानकारी दी है कि डोकलाम क्षेत्र में चीन की सेना फिर आ गई है। अमेरिका के समाचार पत्रों का हवाला देते हुए सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि डोकलाम में चीनी घुसपैठ पर भारत अपनी विजय बता रहा था।
राष्ट्रपति ट्रंप ने मई महीने में भारत-चीन सीमा विवाद को लेकर मध्यस्थता का प्रस्ताव दिया था। इसे तब भारत और चीन दोनों ने खारिज कर दिया था। इसके बाद दो जून को प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की बीत हुई थी। चीन ने भी प्रतिक्रिया में कहा था कि भारत और चीन के द्विपक्षीय फोरम काफी मजबूत हैं।
दोनों देश आपस में चर्चा करके अपने मुद्दे सुलझा लेंगे। इसमें किसी तीसरे पक्ष की जरूरत नहीं है। इसके कुछ समय बाद पांच जून को दोनों देशों के संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारियों ने बात की। छह जून को लेफ्टिनेंट जनरल स्तर के अधिकारियों ने बातचीत की। सैन्य कमांडरों के बीच में निर्णायक बातचीत के संकेत आने लगे।
अचानक 15 जून को दोनों देशों के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प ने पूरे मामले को नया मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया। ऐसे में एक बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत, अमेरिका जैसे देशों की मदद ले रहा है? क्या अमेरिका विवाद कम करने के लिए प्रयास कर रहा है।
हालांकि जिस तरह से अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और राष्ट्रपति ट्रंप के बयान आ रहे हैं, वह कुछ संदेश तो दे रहे हैं।
कोई भी जानकारी भारतीय विदेश मंत्रालय या रक्षा मंत्रालय, सेना मुख्यालय पुष्ट नहीं है, लेकिन सूचना है कि चीन की सेना ने पैंगोंग त्सो क्षेत्र में अपने बंकर बना लिए हैं। सैन्य ढांचा भी तेजी से खड़ा किया है। फिंगर 4 से 8 तक चीन के सैनिक डटे हैं। यहां उन्होंने अपने सैन्य स्ट्रक्चर भी बना लिए हैं।
यह सबसे महत्वपूर्ण और ऊंचाई वाला क्षेत्र है। चीन फिंगर छोड़ने के पक्ष में नहीं है। इसे लेकर चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी कोई बात नहीं करना चाहती। जबकि इससे पहले फिंगर 1, 2, 3 तक चीन के सैनिक गश्त करते रहे। फिंगर 3 और चार के बीच में आईटीबीपी की पोस्ट रही है।
फिंगर 4 से 8 तक भारतीय सुरक्षा बल गश्त करते रहे हैं। अब चीन की सेना फिंगर 4 से 8 तक भारतीय सुरक्षा बलों को नहीं जाने दे रही है। दोनों देशों के सैन्य कमांडरों के बीच में इसको लेकर चर्चा भी नहीं हो पा रही है और न चीन अपनी जिद छोड़ रहा है।
अब आइए गलवां नदी घाटी क्षेत्र में। पेट्रोलिंग प्वाइंट 14 पूरी तरह से भारतीय सुरक्षा बलों के पास नहीं है। भारत और चीन की फौज अपनी-अपनी वास्तविक नियंत्रण रेखा की सीमा में हैं, लेकिन चीन की फौज ने भारतीय हिस्से को भी दबा रखा है।
गलवा नदी के इसी क्षेत्र भारत और चीन के फौजियों के बीच में 15 जून को हिंसक झड़प हुई थी। सैन्य कमांडरों और राजनयिक स्तर की बातचीत के बाद चीन ने भारत के 10 सैनिकों को तीन दिन बाद छोड़ दिया, लेकिन जमीनी दावे पर अड़ा हुआ है।
4-5 मई 2020 को चांग ला के पास भारत और चीन के सुरक्षा बल पहली बार टकराए थे। तब हमारे चार-पांच जवान चीनी हमले का शिकार हुए थे। तब से चीन ने लद्दाख क्षेत्र में काफी कुछ सैन्य संरचना खड़ी कर ली है। सैन्य कमांडरों के बीच बातचीत के दौरान भी वह अपनी इस कोशिश में लगा हुआ था।
चीन उत्तराखंड से अरुणाचल तक भारत के चारों तरफ सैन्य घेरा बढ़ा रहा है। भारत ने चीन की चाल को समझ कर उत्तराखंड, लद्दाख, सुकना, सिक्किम से लेकर अरुणाचल तक अपनी सेना को हाई अलर्ट पर रखा है। सेना ने अपनी आर्टिलरी, इंफैंट्री से हर चुनौती के लिए तैयार रहने को कहा है।
माउंटेन ब्रिगेड भी स्थिति पर नजर रख रही है। वायुसेना और नौसेना अपनी चुनौतियों को समझ रहीं है। वायुसेनाध्यक्ष एयरचीफ मार्शल राकेश भदौरिया तैयारी और संदेश देने के इरादे से ही लद्दाख क्षेत्र में समय बिताकर श्रीनगर होते हुए आए हैं।
चीन के अखबार लगातार पाकिस्तान और नेपाल से भारत की तरफ बढ़ रही चुनौती की तरफ भी इशारा कर रहे हैं। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिजिआन के बयान भी भारत के दावे को खारिज कर दे रहे हैं। यहां तक कि विदेश मंत्री वांग यी और विदेश मंत्री एस जयशंकर के बीच में टेलीफोन वार्ता के बाद भी चीन का रुख अड़ियल बना हुआ है।
हालांकि दोनों देशों के नेताओं में 23 जून को रूस-चीन, भारत फोरम पर वर्चुअल बातचीत होगी। इस दौरान द्विपक्षीय मुद्दों पर भी चर्चा के आसार हैं।
पड़ोसी के साथ किसी भी विवाद का भारत द्विपक्षीय, सौहार्दपूर्ण और चर्चा के जरिए हल चाहता है। भारत चाहता है कि सीमा विवाद पर चर्चा और आम सहमति बनने तक चीन की फौज अप्रैल 2020 की स्थिति में लौट जाए।
इसी के साथ नई दिल्ली ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री एस जयशंकर और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के वक्तव्य से स्पष्ट किया है कि भारत दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। नई दिल्ली अपनी संप्रभुता, देश की अखंडता के लिए प्रतिबद्ध है और हर इंच जमीन की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।