ईरान संकट से कई महत्त्वपूर्ण वस्तुओं के आयात-निर्यात पर असर पड़ा है। खाड़ी देशों को होने वाले निर्यात में गिरावट दर्ज की गई है। भारत के कई क्षेत्रों में कच्चे माल की उपलब्धता पर भी संकट गहरा सकता है। पेट्रोल-डीजल का पर्याप्त भंडार होने के कारण इनकी उपलब्धता में कोई परेशानी नहीं आई है, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों में वृद्धि का असर खुदरा क्षेत्र पर भी देखने को मिलने लगा है। प्राइवेट कंपनियां तेल कीमतें बढ़ाने लगी हैं। यदि यह संकट जल्द नहीं सुलझता है तो आने वाले समय में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को भी कीमतों में वृद्धि करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इससे महंगाई बढ़ सकती है और ईरान संकट में आम आदमी झुलस सकता है।
केंद्र और राज्य सरकारों के लगातार प्रयासों के बावजूद आम उपभोक्ताओं को गैस मिलने में परेशानियां आ रही हैं। बिना रजिस्टर हुए उपभोक्ताओं पर गैस की कमी से सबसे ज्यादा असर पड़ा है। अनेक होटल-रेस्टोरेंट्स को अपना कामकाज सिमित या बंद करना पड़ा है। युद्ध के एक महीने होने के बाद भी इन क्षेत्रों की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया है।
सरकार गैस उपलब्धता सुनिश्चित करने के अनेक उपाय कर रही है। होर्मुज स्ट्रेट से भारतीय जहाजों के आवागमन की अनुमति मिलने से भी गैस संकट कम होने के संकेत मिले हैं। लेकिन एक तरफ रूस के द्वारा अपने घरेलू बाजार की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए तेल के निर्यात पर रोक लगाने और क़तर जैसे महत्त्वपूर्ण गैस उत्पादक देशों की उत्पादन क्षमता प्रभावित होने से गैस की उपलब्धता लम्बे समय तक प्रभावित हो सकती है। हालांकि, केंद्र सरकार वैकल्पिक उपाय कर इस असर को लगातार कम करने के प्रयास कर रही है।
इस संकट का सबसे तेज असर कृषि और वस्त्र उद्योग के ऊपर पड़ता दिखाई पड़ा है। बासमती चावल के साथ-साथ खाड़ी देशों को निर्यात होने वाली सभी प्रमुख वस्तुओं का निर्यात प्रभावित हुआ है। इसके साथ-साथ भारत के जो निर्माण क्षेत्र कच्चे माल के लिए विदेशों पर निर्भर करते हैं, उनमें कच्चे माल की उपलब्धता पर भी संकट बढ़ा है। चीन जैसे देशों से आयात होने वाले कच्चे माल की उपलब्धता में कोई संकट नहीं आया है, लेकिन कच्चे माल की कीमतों में लगातार तेजी दिख रही है। इसका असर वस्तुओं की निर्माण लागत और अंततः उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ सकता है।