किसी भी फोर्स या विभाग में इतने ज्यादा पद खाली होने से वहां की कार्यप्रणाली प्रभावित होना निश्चित है। अगर कैडर के अफसरों की मानें, तो आईपीएस अधिकारी केवल उन पदों पर आना चाहते हैं, जहां वे अपनी पावर का भरपूर इस्तेमाल कर सकें। आज भी जोखिम भरे, भागदौड़ वाले कार्य और आतंकी या नक्सली ऑपरेशन में कैडर के अधिकारियों को ही भेजा जाता है।
विभिन्न बलों के कैडर अफसरों का कहना है कि आईपीएस अधिकारी करियर की शुरुआत के दौरान अपने मूल कैडर में बतौर एसपी काम करना चाहते हैं। इसके बाद वरिष्ठ होने पर उनकी अगली प्रमोशन डीआईजी के पद पर होती है, तो भी वे मूल कैडर में ही रहना पसंद करते हैं। केवल वही अफसर अपने कैडर से बाहर किसी दूसरे बल में जाना पसंद करते हैं, जिन्हें अच्छी या सुविधाजनक पोस्टिंग मिलती है। चूंकि अर्धसैनिक बलों में कमांडेंट स्तर के अधिकारी विभिन्न ऑपरेशन में भाग लेते हैं। इसके अलावा वहां तैनात डीआईजी को भी ऐसे अभियानों को बहुत करीब से देखना होता है।
आरोप है कि बहुत से आईपीएस अधिकारी इन्हीं जोखिमों से बचना चाहते हैं। वे जैसा फायदा चाहते हैं, कथित तौर पर वह सब उन्हें अर्धसैनिक बलों में बतौर डीआईजी या एसपी में नजर नहीं आता। जैसे ही वे आईजी या एडीजी बनते हैं, तो उनकी ललक अपने मूल कैडर से बाहर काम करने की हो जाती है। वे डेपूटेशन पर केंद्र की सेवाओं में आना चाहते हैं, क्योंकि यहां उनका दायरा काफी बड़ा होता है। जैसे सीआरपीएफ के चार जोन हैं, इनमें से तीन जोन में स्पेशल डीजी और एक में एडीजी तैनात है। इसी तरह सेक्टर पर आईजी का पद बहुत अहम जाता है। डीआईजी ग्रुप सेंटर और रेंज में लगते हैं। बीएसएफ में भी आईजी को एक पूरा फ्रंटियर हेड करने का अवसर मिलता है। यही वजह है कि आईजी और इससे ऊपर के पदों पर आईपीएस अधिकारी खुशी से ज्वाइन कर लेते हैं।
डीजी 9 1
एसडीजी 6 1
एडीजी 17 1
आईजी 78 9
डीआईजी 144 76
एसपी 29 14
बीपीआरएंडडी 12 3
बीएसएफ 26 6
सीआईएसएफ 20 13
सीआरपीएफ 37 16
आईटीबीपी 12 11
एनसीआरबी 3 3
एनईपीए 1 1
एसएसबी 25 21
नोट: ये स्थिति तब है, जब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आईपीएस के खाली पड़े अधिकांश पदों पर अस्थायी तौर से संबंधित बल के कैडर अफसरों को नियुक्ति कर दिया है। जैसे बीएसएफ में आईपीएस के लिए खाली पड़े डीआईजी के 15 पद अस्थायी तौर पर कैडर के अधिकारियों को दे दिए हैं। इसी तरह देश के सबसे बड़े अर्धसैनिक बल सीआरपीएफ में भी डीआईजी (आईपीएस) के 18 पदों पर कैडर के अधिकारियों को लगाया गया है। बीपीआरएंडी में आईपीएस के लिए स्वीकृत 12 पदों में से से ज्यादातर पद नॉन-आईपीएस के जरिए भरे गए हैं। एसएसबी में भी आईपीएस के 3 पद कैडर अफसरों को मिल गए हैं। ध्यान रहे कि कैडर अधिकारियों को मिले ये सभी पद अस्थायी हैं।
बता दें कि चार-पांच वर्षों से गृह मंत्रालय में आईपीएस और विभिन्न अर्धसैनिक बलों के कैडर अफसरों के बीच अपने हितों को लेकर विवाद चल रहा है। इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी गत फरवरी में कैडर अफसरों के पक्ष में फैसला सुना दिया। इसमें कहा गया कि केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को ग्रुप-ए की संगठित सेवाओं का दर्जा देकर वहां तत्काल प्रभाव से एनएफएफयू (नॉन फंक्शनल फाइनेंसियल अपग्रेडेशन) लागू किया जाए। यानी एक तय समय के बाद यदि अगला रैंक (किसी वजह से जैसे सीट खाली नहीं है या कोई दूसरी दिक्कत है) नहीं मिलता है, तो उस रैंक के सभी वित्तीय फायदे संबंधित अधिकारी को दें।
इसके खिलाफ आईपीएस एसोसिएशन भी सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गई। आरोप है कि केंद्र सरकार ने कथित तौर पर आईपीएस का पक्ष लेते हुए सुप्रीम कोर्ट में इस मामले का हल करने के लिए एक कमेटी गठित करने की बात कह दी। इसके लिए 17 जुलाई तक का समय ले लिया गया। हालांकि अभी तक एनएफएफयू बाबत कोई भी अंतिम फैसला नहीं हो सका है। गृह मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि इस मामले में सरकार काफी आगे बढ़ चुकी है। संभवतया अगले माह तक कोई न कोई फैसला हो जाएगा।
अर्धसैनिक बल जैसे सीआरपीएफ, एसएसबी, आईटीबीपी, बीएसएफ और सीआईएसएफ के अफसर संगठित कैडर सर्विस में नहीं आते हैं। हालांकि इनकी भर्ती भी यूपीएससी करता है और आईपीएस भी यूपीएससी से निकलते हैं, लेकिन आईपीएस संगठित कैडर सर्विस में आते हैं। इसका मतलब है कि उन्हें एक तय सीमा के बाद प्रमोशन मिलेगा। अगर किन्हीं कारणों से अगला रैंक नहीं मिल पा रहा है, तो तब तक उन्हें उस रैंक के सभी वित्तीय एवं दूसरे फायदे मिल जाते हैं। यह सुविधा अर्धसैनिक बलों के अफसरों को नहीं मिलती। नतीजा, वे प्रमोशन में पिछड़ जाते हैं और दूसरे वित्तीय फायदों से भी वंचित रहते हैं।
सीआरपीएफ के पूर्व आईजी वीपीएस पंवार का कहना है कि बीस साल की सेवा के बाद आईपीएस अधिकारी आईजी बन जाता है, लेकिन कैडर अफसर उस वक्त कमांडेंट तक पहुंच पाता है। 33 साल की नौकरी के बाद कैडर अफसर बड़ी मुश्किल से आईजी बन पाता है। वजह, अर्धसैनिक बलों को संगठित कॉडर सेवा का दर्जा नहीं दिया गया है। अब सुप्रीम कोर्ट से कैडर अफसरों के हित में फैसला दे दिया है, तो आईपीएस अफसर खुद को विचलित महसूस कर रहे हैं।
चूंकि गृह मंत्रालय में पूरी तरह से आईपीएस लॉबी का दबदबा है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को टालने की हर जुगत लगाई जा रही है। आईपीएस एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी थी कि उसे भी इस मामले में पार्टी बनाया जाए। हालांकि अदालत ने यह याचिका खारिज कर दी थी।
बता दें कि अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू होता है, तो कम से कम अर्धसैनिक बलों के दस हजार अफसरों को इसका फायदा पहुंचेगा। यदि सीआरपीएफ की बात करें, तो 23 डीआईजी, जो आज 33 साल की नौकरी पूरी कर चुके हैं, वे तुरंत प्रभाव से आईजी बन जाएंगे। 3 आईजी एडीजी रैंक पर होंगे, 40 कमांडेंट डीआईजी बनेंगे और एक एडीजी स्पेशल डीजी बन सकता है। खास बात है कि एनएफएफयू (नॉन फंक्शनल फाइनेंसियल अपग्रेडेशन) लागू करने के लिए जो कमेटी बनाई गई है, उसमें सभी सदस्य आईएएस हैं या आईपीएस हैं। कमेटी में अर्धसैनिक बलों का कोई प्रतिनिधि नहीं यानी कैडर अफसर शामिल नहीं है।