सुस्ती में फंसे रियल एस्टेट क्षेत्र को उबारने के लिए सरकार ने बीते छह नवंबर को 25,000 करोड़ रुपये के विशेष कोष की घोषणा की थी। हालांकि, इस तरह का कोष बनाने की अपील करीब तीन साल पहले से की जा रही थी। यह कोष कैसे रियल एस्टेट क्षेत्र और निवेशकों व मकान खरीदारों की मदद करेगा, इस पर अमर उजाला के शिशिर चौरसिया ने नेशनल रियल एस्टेट डेवलपमेंट काउंसिल (नरेडको) अध्यक्ष निरंजन हीरानंदानी से बातचीत की। पेश हैं अंश :
प्रश्न- अभी देश में कितने मकानों का निर्माण अधूरा है और एनसीआर में इनकी कितनी संख्या है?
उत्तर- इस समय देश में छह लाख से अधिक मकानों का निर्माण अधूरा है, जिसमें से 2-2.5 लाख मकान एनसीआर में ही हैं। यदि इस कोष से इनमें से आधे भी पूरे हो गए तो बाकी का काम भी धीरे-धीरे आगे बढ़ेगा। एनसीआर में स्थिति ज्यादा जटिल है, इसलिए हमने पहले भी यहां के लिए पांच हजार करोड़ रुपये का कोष मांगा था।
एनसीआर की हालत सुधारने के लिए 15,000 करोड़ रुपये की जरूरत होगी। एक बार परियोजनाएं पूरी होना शुरू होंगी तो डेवलपर के पास पैसा आएगा, जिससे अन्य परियोजनाओं का निर्माण भी जल्द पूरा हो सकेगा और रियल एस्टेट क्षेत्र तेजी पकड़ सकेगा।
प्रश्न- कोष की घोषणा हो गई है तो हालात कब तक सुधरने के आसार हैं?
उत्तर- हमने जनवरी 2017 में सरकार से अपील की थी कि रियल एस्टेट सेक्टर की मदद के लिए एक स्ट्रेस फंड बनाया जाए। हमने गाजियाबाद, नोएडा और ग्रेटर नोएडा का उदाहरण देकर समझाया था कि जब तक ऐसा नहीं किया जाएगा, तब तक ये मसला सुलझेगा नहीं। अब स्ट्रेस फंड की घोषणा हो गई है।
मेरा मानना है कि यह कोष 15 दिन में काम करना शुरू कर देगा। अभी इस कोष से सहायता के लिए आवेदन दिया जाएगा, जिस पर शीघ्र ही फैसला हो जाएगा। एक बार काम शुरू हो जाए तो अगले कुछ महीने में ही आपको फर्क दिखना शुरू हो जाएगा। हमें लगता है कि अगले साल से आप इसे महसूस करने लगेंगे।
प्रश्न- कोष से सहायता लेने के लिए कुछ शर्तें भी हैं। इसे आप सही मानते हैं?
उत्तर- इस कोष से सहायता लेने के लिए जिन दो शर्तों की बात कही जा रही है, वह तर्कसंगत नहीं थीं। शर्त के अनुसार, ऐसी परियोजनाएं जो एनपीए हो गई हैं या जिनका मामला नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में चला गया है, उन्हें शामिल नहीं किया जाएगा। ऐसे में देखा जाए तो 90 फीसदी परियोजनाएं इस समय या तो एनपीए हैं या उनका मामला एनसीएलटी में चला गया है।
ग्रेटर नोएडा में तो 100 फीसदी परियोजनाएं ऐसी हैं, तो उन्हें इसका फायदा ही नहीं मिलेगा। हमारी अपील को सरकार ने माना और ऐसी परियोजनाओं को भी फायदा देने की बात कही है। अभी लागू पॉजिटिव नेटवर्थ की शर्त से फायदा होगा, क्योंकि सरकार से पैसा मिलने के बाद परियेाजना पूरी हो सकेगी और बिल्डर का फंसा पैसा भी निकल आएगा।
प्रश्न- इस कोष का प्रबंधन कैसे होगा?
उत्तर- वित्त मंत्रालय ने यह काम एसबीआई कैप्स को दिया है। देखा जाए तो यह सही फैसला है, क्योंकि उसे पता है कि कोष का प्रबंधन कैसे करना है और किसे इसकी ज्यादा जरूरत है। इस कोष से राशि लेने के लिए जो दो शर्तें और जोड़ी गई हैं। परियोजना में पैसे बैलेंस होने चाहिए और 60 फीसदी काम हो चुका हो। हालांकि, पहले उनकी मदद की जाएगी जिनका काम करीब 90 फीसदी पूरा हो चुका है।
प्रश्न- वित्त मंत्रालय ने कहा है कि मुंबई में दो करोड़ रुपये तक के मकान और शेष भारत में डेढ़ करोड़ रुपये तक के मकानों की परियोजनाओं को ही सहायता मिलेगी। इस बंधन को सही मानते हैं?
उत्तर- सरकार का ध्यान जरूरतमंदों को मकान दिलाने पर है। इसलिए यह सही कदम है। इस राशि में पार्किंग, सोसाइटी चार्जेज, पंजीकरण आदि का शुल्क शामिल नहीं है, इसलिए यह राशि पर्याप्त है। मुझे लगता है कि इससे यह योजना व्यावहारिक हो गई है और सभी को फायदा होगा।
प्रश्न- सहायता मिलने के बाद परियोजना की देखरेख पुराने बिल्डर के पास ही रहेगी या किसी अन्य को जिम्मेदारी दी जाएगी?
उत्तर- परियोजना कौन देखेगा, यह बड़ी बात है। जाहिर है कि एसबीआई कैप्स तो देखेगा नहीं, वह पैसे ही दे सकता है। यदि संबंधित परियोजना का डेवलपर सक्षम है तो वह भी ऐसा कर सकता है। परियोजना के खरीदारों का संगठन बने तो वह भी ऐसा कर सकता है। यदि सहमति बनती है तो कोई कांट्रैक्टर भी उसे पूरा कर सकता है या बिल्डर बदला जा सकता है।
एनसीआर की परियोजनाएं सबसे ज्यादा संकटग्रस्त हैं। यहां मकान निर्माण पूरा करने के लिए 15 हजार करोड़ रुपये की जरूरत होगी।
-निरंजन हीरानंदानी, अध्यक्ष, नरेडको