महिलाओं का कहना है कि घरेलू हिंसा अधिनियम उनके लिए जितना सहायक दिखता है वास्तिवकता में वैसा नहीं है। पीड़ित महिलाएं इससे परेशान हो चुकी हैं। एक पीड़ित महिला का कहना है कि भले ही ये अधिनियम महिलाओं के लिए बनाया गया है पर इससे उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ। महिला का कहना है कि अधिनियम में न्याय की अवधि 6 माह बताई गई है जबकि उन्हें कोर्ट में केस लगाने में ही 6 माह लग गए। वह एक साल से कोर्ट के चक्कर लगा रही हैं।
यानि इस अधिनियम से महिलाओं को कब न्याय मिलेगा और मिलेगा भी या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है। कुछ महिलाएं अधिनियम की इन कमियों की वजह से तो कुछ धन और जानकारी के अभाव में इसका प्रयोग नहीं कर पाती हैं।
यह अधिनियम बनाया तो महिलाओं के लिए गया है पर इसमें कुछ ऐसी बातें भी हैं जिनका प्रयोग बचाव पक्ष वाले कर लेते हैं और उन्हें रियायत मिल जाती है। ऐसे में अधिनियम में कुछ संशोधन होने आवश्यक हैं। जैसे-
1. न्याय जल्दी दिलाने की बजाय इसमें प्रयास शब्द का बहुत इस्तेमाल किया जाता है जिसके कारण दो माह की बजाय पेशी बढ़ती जाती है।
2. इसमें संशोधन करके महिलाओं के संरक्षण का कानून भी पारित होना चाहिए।
3. इस तरह की शिकायतों के निपटारे के लिए विशेष अदालतों का गठन किया जाना चाहिए।
4. महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए।