अगर अचानक हमारे और आपके सामने कोई बाघ आ जाए तो इसकी कल्पना करके ही रूह कांप जाती है। बाघ की एक बनी बनाई खूंखार तस्वीर आंखों के सामने छा जाती है और उसके बाद ऐसा लगता है कि भारत का राष्ट्रीय पशु न सिर्फ आदमखोर होकर हमला कर देगा बल्कि जान भी ले लेगा। लेकिन हकीकत में बाघ के साथ ऐसा नहीं है। आईएफएस अधिकारी रमेश पांडेय देश के बड़े टाइगर रिजर्व फॉरेस्ट इलाके में बाघों के साथ तकरीबन डेढ़ दशक से ज्यादा का वक्त गुजार चुके हैं, उनका कहना है कि देश के लोगों को बाघों के प्रति बनाई गई खूंखार जानवर की छवि को बदलना ही होगा। क्योंकि वास्तव में बाघ न तो आदमखोर हैं और न ही वह खूंखार जानवर है। टाइगर मैन के नाम से जाने जाने वाले रमेश पांडे ने देश के बाघों के कुनबे को बढ़ाने में बड़ा योगदान भी दिया है।
रमेश पांडे कहते हैं कि दुधवा नेशनल पार्क, पीलीभीत टाइगर रिजर्व पार्क और कतर्नियाघाट जैसे टाइगर रिजर्व फॉरेस्ट में डेढ़ दशक से ज्यादा वक्त तक करीब से उन्होंने बाघों के व्यवहार को नजदीकी से देखा है। उनका कहना है कि इस बात की पुष्टि हुई कि बाघ न तो आदमखोर है और न ही वह लोगों पर हमला करता है। वे कहते हैं कि अपने डेढ़ दशक से ज्यादा के घने जंगलों में काम करने के दौरान सैकड़ों फॉरेस्ट गार्ड और अधिकारियों ने बाघ को अपने बहुत करीब से न सिर्फ देखा है, बल्कि उनके लिए शेल्टर भी तैयार किया है। वह कहते हैं कि अगर बाघ इतना ही खूंखार होता तो वन विभाग के हर कर्मचारी अधिकारी और सुरक्षाकर्मी शायद जंगल में रहकर टाइगर रिजर्व फॉरेस्ट इलाके में काम नहीं कर पाते।
उत्तर प्रदेश में इस वक्त पीलीभीत टाइगर रिजर्व फॉरेस्ट में बाघों की संख्या तकरीबन 70 के करीब हो चुकी है। जबकि इसी इलाके के कतर्नियाघाट में भी बाघों की संख्या भी तकरीबन इतनी ही है। एक वक्त था जब कतर्नियाघाट में तो बाघों की संख्या महज एक या दो हुआ करती थी। इस वक्त तकरीबन दो सौ किलोमीटर लंबे कतर्नियाघाट, दुधवा नेशनल टाइगर पार्क और पीलीभीत टाइगर रिजर्व फॉरेस्ट एरिया में तकरीबन 300 बाघ हैं। बाघों के इस कुनबे को बढ़ाने के लिए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने भारतीय वन सेवा के अधिकारी रमेश पांडे के प्रयासों की सराहना भी की। वह कहते हैं कि बाघों की संख्या बढ़ी है। इसके लिए कई बिदुंओं पर काम किया गया है। सबसे पहले बाघों के कुनबे को बढ़ाने के लिए यह प्रयास किया गया कि जंगल के इलाके में बेवजह लोगों का हस्तक्षेप न हो। जंगलों का जो मूल स्वरूप है उसमें किसी भी तरीके की छेड़छाड़ का मतलब जानवरों की कमी ही होती है। वे कहते हैं उन्होंने बाघों के कुनबे को बढ़ाने के लिए जंगल के स्वरूप को जस का तस रहने के साथ-साथ उनके नेचुरल हैबिटेट को प्रोटेक्ट किया गया। ताकि बाघों की ब्रीडिंग हो सके, और नतीजा सबके सामने है। इस वक्त पूरे देश में तकरीबन तीन हज़ार के करीब टाइगर रिजर्व फॉरेस्ट में बाघों की संख्या है। जो कि लगातार बढ़ रही है।