सन 1952 में पाकिस्तान सरकार मे पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में उर्दू को राष्ट्रीय भाषा बनाने की घोषणा की। ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने सरकार के इस फैसले के विरोध में विश्विविद्यालय परिसर में सभा शुरू की। वहां पहले से ही धारा 144 लागू थी। यहां विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर और अन्य अधिकारियों की मौजूदगी के साथ सशस्त्र पुलिस बल ने परिसर को घेर रखा था।
वहां मौजूद छात्रों में से 11 ने विश्विविद्यालय के द्वाक पर पुलिस की दीवार को पार करने का प्रयास किया, पुलिस ने इसपर आंसू गैल के गोले दाग कर छात्रों को चेतावनी दी। छात्रों का एक वर्ग को वहां से भाग निकलने में कामयाब रहा लेकिन अन्य को पुलिस ने घेर लिया। पुलिस ने कई छात्रों को धारा 144 का उल्लंघन करने के अपराध में गिरफ्तार कर लिया।
गिरफ्तारी से गुस्साएं छात्रों ने पूर्वी बंगाल विधानसभा में विधायकों का मार्ग रोककर उन्हें इस मामले को विधानसभा में पेश करने का आग्रह किया। इसी दौरान आक्रोशित छात्रों का एक दल विधानसभा की इमारत में चढ़ने लगा। छात्रों को रोकने के लिए पुलिस ने आग के गोले फेंकने शुरू कर दिए। पुलिस की इस कार्रवाई में कई छात्रों की मृत्यु हो गई।
इस घटना के बाद से सरकार के भाषा संबंधित फैसले का विरोध विश्वविद्यालय से निकल कर आम जनों कर पहुंच गया। लोगों ने शहर की सभी दुकानों, कार्यालयों और सार्वजनिक परिवहन आदि को बंद कर दिया और हड़ताल शुरू कर दी।
इस घटना के बाद सात मई 1954 में संविधान सभा ने बंगाली भाषा को यहां की आधिकारिक भाषा घोषित कर दिया। इसके साथ ही 29 फरवरी 1956 को बंगाली भाषा को पाकिस्तान की दूसरी आधिकारिक भाषा होने की मान्यता मिली। आज के दिन बांग्लादेश में सार्वजनिक आवास होता है। इस आंदोलन ने पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश बनने में भी अहम भूमिका निभाई थी।