भारत सहित पूरी दुनिया में हर साल 10 दिसंबर को विश्व मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। दुनिया में जब कोई इंसान पैदा होता है तो उसे कुछ अधिकार खुद-ब-खुद मिल जाते हैं। दुनिया में आजादी, बराबरी और सम्मान के साथ रहना इंसान का जन्मसिद्ध अधिकार है। उसे अपने अधिकारों का पता हो या न हो लेकिन समाज और सरकारों की जिम्मेदारी होती है कि वे उसके मानव होने के अधिकारों की रक्षा करें। अगर कोई वंचित है तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे हमेशा वंचित ही रखा जाए। इस अवसर पर दुनियाभर के 48 देश संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंबली में एक साथ होंगे। यह मानवता के खिलाफ हो रहे अत्याचारों को रोकने का एक वैश्विक प्रयास है।
ये अधिकार हर मनुष्य को जन्म से प्राप्त हैं। दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति को इन अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए। लेकिन भारत में जो आंकड़े आए हैं वह बेहद चौंकाने वाले हैं। एक संस्था द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में 86 फीसदी लोग अपने अधिकार नहीं जानते हैं।
संस्था द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में सबसे ज्यादा बुजुर्गों के मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है। जिन बुजुर्गों के साथ अत्याचार होता है उनमें अधिक संख्या में छोटे परिवारों से हैं। जिन्हें सिस्टम से संपर्क साधने संबंधित कोई जानकारी नहीं है। संस्था ने इस अध्ययन में पांच हजार लोगों को शामिल किया है।
जहां शहरों में साक्षर लोगों का आंकड़ा गांवों के मुकाबले अधिक माना जाता है। वहीं रिपोर्ट में कुछ और ही बात सामने आई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरी इलाकों में स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। यहां 23 फीसदी लोग अमानवीय परिस्थिति में रहने को मजबूर हैं। वहीं 13 फीसदी लोगों का कहना है कि उन्हें उनकी उम्र के मुताबिक उचित भोजन नहीं मिलता है। अध्ययन के अनुसार देश में 68.8 फीसदी लोगों को जरूरी दवाएं और स्वास्थ्य सेवाएं भी उपलब्ध नहीं हैं।
रिपोर्ट के आंकड़ों से पता चलता है कि सर्वेक्षण में शामिल आधे लोगों का कहना है कि उनके साथ होने वाले भेदभाव और अपमान का कारण उनकी बढ़ती उम्र है। जो लोग इन अधिकारों से अंजान हैं उनमें अधिकतर की आयु 60-70 साल के बीच है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि मानवाधिकारों के बारे में जागरुकता की कमी है।
बच्चों की बेहतर स्थिति पर किए गए एक अध्ययन में 172 देशों को शामिल किया गया था। जिसमें भारत का नंबर 116वां है। हैरान करने वाली बात ये है कि इस मामले में श्रीलंका (61वां), भूटान (93वां) और म्यांमार (112वां) की स्थिति भारत से बेहतर है। वहीं नेपाल (134वां), बांग्लादेश (134वां) और पाकिस्तान (148वें) की स्थिति भारत से काफी खराब है।
भारत में 3.1 करोड़ बच्चे और अव्यस्क बाल मजदूरी में लगे हुए हैं। ये आंकड़ा दुनिया के किसी भी देश से अधिक है। इनकी उम्र 4-18 साल के बीच है। वहीं 4.8 करोड़ बच्चों को जरूरत के मुताबिक भोजन नहीं मिल पा रहा है। बता दें ये आबादी कोलंबिया की कुल आबादी के बराबर है।
मानवाधिकारों के मामले में सीरिया के हालात सबसे अधिक खराब पाए गए हैं। यहां 6 सालों में 5 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई है। यहां सबसे ज्यादा इन अधिकारों का उल्लंघन होता है। वहीं बीते 6 सालों में सीरिया से करीब 1.3 करोड़ लोगों ने अपना घर छोड़ा दिया है और शरणार्थी बन गए हैं। यहां के 35 लाख बच्चे मूलभूत अधिकारों से वंचित हैं। यह आंकड़े शरणार्थियों के अधिकार समूह ने जारी किए हैं। आंकड़े मार्च 2011 से नवंबर 2017 के बीच के हैं। जिन लोगों की मौत हुई है उनमें बच्चों की संख्या 26,466 है।
भारत में मानवाधिकार कानून 28 सितंबर, साल 1993 को अमल में आया था। इसके बाद अक्तूबर, साल 1993 में सरकार ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया। पहली बार विश्व मानवाधिकार दिवस की घोषणा 10 दिसंबर, साल 1948 को संयुक्त राष्ट्र ने की थी। संयुक्त राष्ट्र असेंबली ने ये घोषणा विश्व मानवाधिकार घोषणा पत्र जारी करने के बाद की। कानून द्वारा संरक्षित इन अधिकारों का प्रत्येक मनुष्य स्वाभाविक रूप से हकदार है।