पूर्व विदेश सचिव शशांक को हाल-फिलहाल अभी पूर्वी लद्दाख में चीन के सैनिकों के एलएसी पर जाने की उम्मीद कम दिखाई दे रही है। वहीं, भारत भी चीन की अनावश्यक धौंसबाजी को नहीं मानने वाला है। ऐसे में पूर्व विदेश सचिव को लग रहा है कि अक्टूबर-नवंबर तक इस दिशा में खास प्रगति होने के आसार कम हैं। शशांक इसके तीन बड़े कारण बताते हैं।
- पहला कारण: पाकिस्तान और रूस के बीच बन रहा नजदीकी रिश्ता है। चीन को लग रहा है कि इस समय वह भारत पर अपना दबाव बनाकर मनमानी कर सकता है। यह चीन का भ्रम भी है।
- दूसरा कारण: कोविड-19 का संक्रमण है। भारत और दुनिया के तमाम देशों को सामने इससे निपटने की चुनौती है। ऐसे में नई दिल्ली का पूरा ध्यान अभी इस स्थिति पर ज्यादा है।
- तीसरा कारण: लद्दाख क्षेत्र में तापमान का बढ़ना और ठंड का कम होना है। तापमान में -40 डिग्री जैसी गिरावट नहीं है। यह स्थिति नवंबर से आएगी, तब तक पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में भारत के पास सैन्य तैनाती और अन्य इंतजाम आदि करने के पर्याप्त समय भी है।
चीन की सरकारी न्यूज एजेंसी ग्लोबल टाइम्स और सीजीटीएन ने चीन के प्रवक्ता के हवाले से बताया कि दोनों पक्षों को पिछली वार्ता में बनी सहमति पर आगे बढ़ना चाहिए। पीएलए के प्रवक्ता के अनुसार, उन्हें उम्मीद है कि भारतीय पक्ष दोनों देशों की सेनाओं की पिछली वार्ता में बनी सहमतियों का पालन करेगा। सीमा पर शांति और सकारात्मक माहौल बनाए रखने के लिए जिस दिशा में चीन आगे बढ़ा है, उसी रास्ते पर आगे बढ़ेगा।
भारतीय सेना ने भी इसी विषय पर बयान जारी किया। भारतीय सेना के बयान के मुताबिक, दोनों देशों के सैन्य कमांडरों के बीच में हाट स्प्रिंग, गोगरा पोस्ट, डेपसांग में विवाद वाले इलाकों में सैन्य वापसी को लेकर विस्तृत चर्चा हुई। सीमा पर शांति बनाए रखने, नए टकराव से बचने और शेष मुद्दों पर तेजी से हल निकालने पर सहमति बनी है। भारतीय सेना ने अंत में कहा कि सैन्य वापसी या वार्ता पर ठोस प्रगति न हो पाने का सबसे बड़ा कारण चीन की सेना का पहले से तय की सोच के आधार पर वार्ता की मेज पर आना था, लेकिन चीन ने अपने रुख में कोई नरमी नहीं दिखाई।
गौरतलब है कि भारत ने 2005-2012 के बीच एडवांस लैंडिंग ग्राउंड दौलत बेग ओल्डी में आधारभूत संरचना को आगे बढ़ाया था। इससे तिलमिला कर चीन ने चुमार और फिर डेपसांग में कई बार निगाहें गड़ाईं। अब इस इलाके में उसकी सेना एलएसी के संभावित क्षेत्र को पार करके भारतीय क्षेत्र तक आ गई है। एडवांस लैंडिग ग्राउंड दौलतबेग ओल्डी, डेपसांग से अक्साईचिन की दूरी 22-24 किमी है। इसके करीब से ही चीन का जी-219 हाईवे गुजरता है। यह हाईवे तिब्बत को शिनजिंयाग प्रांत से जोड़ता है। इसे लेकर चीन काफी संवेदनशील है, क्योंकि भारत सामरिक दृष्टि से काफी अच्छी स्थिति में है। कहा जा सकता है कि चीन की सेना के यहां पीछे हटने के बाद कभी तनाव की स्थिति आने पर भारतीय सेना को अक्साईचिन, तिब्बत या शिनजियांग प्रांत तक पहुंचने में ज्यादा मशक्कत नहीं होगी। ऐसे में चीन इस इलाके में बफर जोन के साथ-साथ सबकुछ सुरक्षित करने की मंशा पाले हुए है।
कूटनीति के जानकारों की मानें तो चीन की निगाह इस समय भारत पर दबाव बनाकर अपना हित साधने की है। वह मई 2020 से दोनों देशों के बिगड़े द्विपक्षीय रिश्ते को पटरी पर लाने के लिए संवेदनशील है। भारत का बड़ा बाजार चीन को काफी समय से ललचा रहा है। ऐसे में वह पहले की तरह द्विपक्षीय व्यापार के बहाने तमाम सहूलियतें भी चाहता है। पिछले वर्षों के द्विपक्षीय व्यापार में चीन अधिक फायदे में रहा। इस तरह की स्थितियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' के लिए बड़ा झटका साबित हो सकती हैं। हालांकि, भारत का मानना है कि सबसे पहले पूर्वी लद्दाख में सीमा पर शांति, सौहार्द, स्थायित्व और विश्वास की बहाली के लिए चीन अपने सैनिकों को पुराने तैनाती वाले स्थल पर ले जाए। विदेश मंत्री एस जयशंकर कई बार बयान देकर कह चुके हैं कि इस तरह की लंबे समय की स्थितियां दोनों देशों के हित में नहीं है। भारत का यह बयान एकतरफा तरीके से वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर स्थिति (अवधारणा) को बदलने चीन की चीन की मंशा से जुड़ा है।