फ्रांस के राष्ट्रपति इमेनुएल मैक्रों
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बीते दिनों का घटनाक्रम संकेत देता है कि भारत के लिए आने वाले दिन विदेश नीति के नजरिए से बड़े संवेदनशील हो सकते हैं। इस्लामिक देशों का भारत को झटका, मसूद अजहर के मामले में सुरक्षा परिषद् में चीन का वीटो, फ्रांस का मसूद अजहर के खिलाफ आक्रामक रवैया और तुर्की ने चीन को मुसलमानों पर अत्याचार करने कर कारण जिस तरह से आड़े हाथों लिया ,वह इस ओर इशारा करता है कि भारत को अपने हितों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मामलों में अधिक चतुराई और समझदारी से काम लेना होगा।
फ्रांस ने मसूद अजहर के मामले में भारत का सबसे ज्यादा साथ क्यों दिया? इसका कारण समझने के लिए फ्रांस की अपनी स्थिति को भी समझना होगा। पिछले पांच साल में वहां करीब एक दर्जन आतंकवादी वारदातें हुईं हैं। इनमें करीब 250 लोग मारे गए और 2,000 से अधिक घायल हुए हैं।
आबादी में मध्य प्रदेश से भी छोटे फ्रांस जैसे देश के लिए ये वारदातें बेहद गंभीर हैं। इन सभी वारदातों के पीछे इस्लामी उग्रवादी समूहों का हाथ था। फ्रांस के लिए भी ये एक बड़ी चुनौती है। इसके अलावा ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने के कारण फ्रांस पर उसका उल्टा असर पड़ सकता है।
फिलहाल फ्रांस, अमेरिका और जर्मनी के बाद ब्रिटेन को सर्वाधिक निर्यात करता है। उसका ब्रिटेन के साथ कारोबार करीब 22 बिलियन पौंड (करीब 20 खरब 20 अरब 58 करोड़ रुपये) के आसपास है। उसके लाखों लोग ब्रिटेन में रहते हैं।
आने वाले दिनों में यदि ब्रिटेन से कारोबारी झटका लगा तो उसे एक बड़े बाजार की जरूरत है। इन दिनों फ्रांस के लिए भारत से बेहतर बाजार कोई दूसरा नहीं है। इसी कारण पिछले साल भारत और फ्रांस के बीच 14 बड़े समझौते हुए थे।
इनमें राफेल लड़ाकू विमानों से लेकर अनेक रक्षा उपकरणों तथा उत्पादन के क्षेत्र में दोनों देश गहरे साझीदार बन कर उभरे हैं। महाराष्ट्र के जैतपुर में छह परमाणु रिएक्टर लगाना भी इसमें शामिल है। चीन की नौ सेना और हिंद महासागर में उसकी आक्रामक मौजूदगी भारत और फ्रांस - दोनों के लिए चिंता का सबब है। दोनों देशों की नौ सेनाएं अलग-अलग कमजोर है। कहा जा सकता है कि भारत को रूस तो नहीं ,लेकिन रूस जैसा सामरिक साझीदार मिल गया है।
सन 2000 से 17 सालों तक फ्रांस का भारत में पूंजी निवेश केवल छह बिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब चार खरब 13 अरब 77 करोड़ रुपये) था। बीते तीन साल के दौरान बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। यह अब करीब दोगुना (12 बिलियन डॉलर) हो गया है। इसमें फ्रांस अपेक्षाकृत लाभ की स्थिति में है। अब भारत पर निर्भर है कि वह फ्रांस के साथ इन रिश्तों को कितनी ऊंचाई तक ले जाता है। फ्रांस तो तैयार बैठा है।